मशहद की ऐतिहासिक दरगाह में आगामी 9 जुलाई को सुपुर्द-ए-खाक किए जाएंगे ईरान के सर्वोच्च कमांडर अयातुल्लाह खामेनेई; जानिए क्यों हर दौर के शासक इसी पवित्र मिट्टी में मिलना चाहते हैं।
मशहद (ईरान)। ईरान का उत्तर-पूर्वी शहर मशहद इस समय पूरी दुनिया की सुर्खियों में है। आगामी 9 जुलाई को ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को यहाँ की पवित्र ‘इमाम रज़ा दरगाह’ में दफ़न किया जाएगा। इस अंतिम संस्कार के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां की जा रही हैं।
लेकिन यह स्थान सिर्फ एक धार्मिक दरगाह भर नहीं है, बल्कि यह इतिहास, कला, अध्यात्म और भू-राजनीति का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है, जहाँ धुर विरोधी और एक-दूसरे के खून के प्यासे रहे किरदारों की कब्रें भी एक साथ मौजूद हैं। आइए समझते हैं कि क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में शुमार इस दरगाह का इतिहास और इसके भीतर दफन हस्तियों का पूरा गणित क्या है।
इस दरगाह के केंद्र में शिया इस्लाम के आठवें इमाम, अली इब्न मूसा अल-रज़ा (इमाम रज़ा) की कब्र है, जिन्हें 818 ईस्वी में अब्बासी खलीफा अल-मामून ने जहर देकर शहीद कर दिया था।
लेकिन इस पवित्र परिसर का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि इमाम रज़ा की कब्र के ठीक बगल में प्रसिद्ध अब्बासी खलीफा हरून अल-रशीद (अलिफ लैला की कहानियों वाले शासक) की भी कब्र है। हरून अल-रशीद, इमाम रज़ा से 10 साल पहले यहाँ मरे थे। इतिहास का इससे बड़ा विरोधाभास क्या होगा कि जिस अब्बासी वंश ने इमामों पर सबसे ज्यादा जुल्म किए, उसी वंश के सबसे शक्तिशाली शासक और शिया आस्था के महान इमाम की कब्रें आज एक ही छत के नीचे हैं।
शाही और धार्मिक हस्तियों के अलावा यह दरगाह उन दिमागों की भी गवाह है जिन्होंने मध्य पूर्व को आधुनिक बनाया:
हाल के वर्षों में यह दरगाह ईरान की आधुनिक राजनीति और राष्ट्रवाद का भी सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरी है:
इब्राहिम रईसी: मई 2024 में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए ईरान के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी इसी मशहद शहर के थे और कभी इस दरगाह के संरक्षक भी रहे थे। उनकी वसीयत के मुताबिक उन्हें इमाम रज़ा के चरणों में दफनाया गया, जिसे अब एक नए राजनीतिक तीर्थ के रूप में देखा जाता है।
अयातुल्लाह अली खामेनेई: मशहद की ही मिट्टी में जन्मे ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को आगामी 9 जुलाई को यहीं सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। उनके लिए स्थान पहले से ही तय था। उनका यहाँ दफन होना यह दिखाता है कि यह स्थान ईरान की धार्मिक और राजनीतिक सत्ता के लिए कितना सर्वोच्च है।
मशहद शब्द का अर्थ ही है ‘शहादत का स्थान’। हर साल यहाँ 3 करोड़ से अधिक तीर्थयात्री आते हैं। इस्लामिक और ईरानी मान्यता के अनुसार, जो भी इमाम रज़ा के पड़ोस में दफन होता है, इमाम फैसले के दिन (क़यामत) ईश्वर से उसके हक में सिफारिश करते हैं।
यही वजह है कि 1000 साल के इतिहास में तैमूरी, सफ़वी, क़ाजार शासकों से लेकर, ईरान-इराक युद्ध के शहीदों, महान उलेमाओं और आधुनिक कूटनीति के शूरवीरों तक— हर कोई इसी सुनहरे गुंबद की छांव में दफन होना अपना सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है।
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