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पूर्व CJI रंजन गोगोई की राज्यसभा से विदाई, 6 साल में न ज्यादा सवाल न ज्यादा बहस; नामांकन पर पुराना विवाद फिर चर्चा में

भारत के 46वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) और राज्यसभा सांसद रंजन गोगोई का संसदीय कार्यकाल आज समाप्त हो गया। 16 मार्च 2020 को सदन की सदस्यता ग्रहण करने वाले जस्टिस गोगोई की विदाई भी उतनी ही चर्चा में है, जितना उनका पूरा कार्यकाल रहा।

विधायी सक्रियता से अधिक ‘मौन’ की चर्चा
जस्टिस गोगोई का संसदीय सफर उनके न्यायिक करियर के बिल्कुल विपरीत रहा। जहाँ कोर्ट रूम में उनकी सक्रियता जगजाहिर थी, वहीं संसद के भीतर उनका योगदान आंकड़ों के लिहाज से काफी सीमित रहा: अपने 6 साल के पूरे कार्यकाल में उन्होंने सदन में एक भी प्रश्न नहीं पूछा।

उन्होंने पूरे कार्यकाल के दौरान केवल 1 बार आधिकारिक चर्चा में भाग लिया। यह भागीदारी अगस्त 2023 में ‘दिल्ली सेवा विधेयक’ पर बहस के दौरान हुई थी। सदन में उनकी उपस्थिति लगभग 53% रही। कम उपस्थिति के पीछे उन्होंने कोरोना महामारी और सदन की बैठने की व्यवस्था जैसे कारणों का हवाला दिया था।

विवादों के घेरे में नामांकन
जस्टिस गोगोई का राज्यसभा पहुँचना स्वतंत्र भारत के सबसे विवादित फैसलों में से एक माना जाता है।

रिटायरमेंट के मात्र 4 महीने बाद उन्हें राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया गया था। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताया और आरोप लगाया कि यह अयोध्या और राफेल जैसे बड़े फैसलों के बदले मिला ‘इनाम’ है।

CJI रंजन गोगोई के ऐतिहासिक फैसले

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद: दशकों पुराने इस धार्मिक और भूमि विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाली संवैधानिक बेंच की अध्यक्षता जस्टिस गोगोई ने ही की थी।

असम NRC: असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लागू करने और उसकी सख्त निगरानी का श्रेय उनके फैसलों को जाता है।

राफेल डील: मोदी सरकार को राफेल विमान सौदे की जांच के मामले में क्लीन चिट देने वाली बेंच के प्रमुख वही थे।

CJI कार्यालय और RTI: उन्होंने ही यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) का कार्यालय भी सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में आता है।

सबरीमाला मामला: मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं को बड़ी बेंच को भेजने का महत्वपूर्ण निर्णय उन्हीं के समय हुआ।

news desk

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