नई दिल्ली: आज इनकम टैक्स देश की आर्थिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में इसकी शुरुआत विकास योजनाओं या जनकल्याण के लिए नहीं हुई थी। दरअसल, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने ब्रिटिश शासन को इतना बड़ा आर्थिक झटका दिया कि नुकसान की भरपाई के लिए अंग्रेजों को भारतीयों की आय पर टैक्स लगाना पड़ा। यही कदम आगे चलकर देश की आधुनिक कर व्यवस्था की नींव बना।
1857 की क्रांति ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे बड़ी चुनौती पेश की थी। इस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों को भारी सैन्य खर्च करना पड़ा, जिससे उनका खजाना लगभग खाली हो गया। बढ़ते कर्ज और वित्तीय संकट से जूझ रही ब्रिटिश सरकार ने नए राजस्व स्रोत तलाशने शुरू किए और इसी से भारत में आयकर की शुरुआत का रास्ता तैयार हुआ।
भारत में पहली बार आयकर लागू करने की घोषणा 24 जुलाई 1860 को की गई थी। इस व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश अर्थशास्त्री सर जेम्स विल्सन को सौंपी गई थी, जिन्हें भारत का पहला वित्त मंत्री भी माना जाता है। उन्होंने भारतीयों के सामने आयकर का प्रस्ताव रखा और एक नई कर प्रणाली की शुरुआत की।
इसी ऐतिहासिक कदम की याद में हर साल 24 जुलाई को आयकर दिवस मनाया जाता है।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम ने ब्रिटिश प्रशासन की आर्थिक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया था। विद्रोह को दबाने के लिए सेना पर खर्च में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई।
आंकड़ों के अनुसार, 1856-57 में सेना पर लगभग 1 करोड़ 14 लाख पाउंड खर्च हुए थे, जो 1857-58 में बढ़कर 2 करोड़ 10 लाख पाउंड तक पहुंच गए। उस दौर में एक पाउंड की कीमत लगभग 10 रुपये मानी जाती थी। इस अतिरिक्त खर्च ने ब्रिटेन की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव डाल दिया।
क्रांति के बाद ब्रिटेन ने भारत की शासन व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया। 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर सीधे ब्रिटिश सरकार शासन संभालेगी।
इसके लिए गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858 लागू किया गया। उस समय तक ब्रिटेन पर 8 करोड़ 10 लाख पाउंड से अधिक का कर्ज चढ़ चुका था। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय संसाधन जुटाने की थी।
ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1859 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेम्स विल्सन को भारत भेजा। उन्हें वायसराय लॉर्ड कैनिंग की परिषद में वित्त सदस्य नियुक्त किया गया।
भारत पहुंचने के बाद उन्होंने 18 फरवरी 1860 को देश का पहला बजट पेश किया। इस बजट में तीन नए करों का प्रस्ताव रखा गया, जिनमें आयकर, लाइसेंस टैक्स और तंबाकू टैक्स शामिल थे। बाद में इन्हीं प्रस्तावों के आधार पर भारत का पहला आयकर कानून लागू किया गया।
जेम्स विल्सन को अंदाजा था कि भारतीय जनता नए कर का विरोध कर सकती है। इसी वजह से उन्होंने अपने भाषण में प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति का उल्लेख किया।
उन्होंने तर्क दिया कि कर वसूली की अवधारणा भारतीय परंपरा का भी हिस्सा रही है और यह पूरी तरह विदेशी विचार नहीं है। हालांकि उनकी इस दलील का खास असर नहीं हुआ और देश के कई हिस्सों में आयकर का विरोध देखने को मिला।
1860 में लागू किए गए पहले आयकर कानून के तहत आय के आधार पर अलग-अलग दरें तय की गई थीं।
यह व्यवस्था उस समय की ब्रिटिश कर प्रणाली से प्रेरित थी।
पहले आयकर कानून की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि सेना, नौसेना और पुलिस विभाग के कर्मचारियों को टैक्स से छूट दी गई थी।
उस दौर में इन विभागों के अधिकांश वरिष्ठ पदों पर अंग्रेज अधिकारी तैनात थे। ऐसे में इस छूट का सबसे बड़ा लाभ भी उन्हें ही मिला, जबकि उनकी आय आम भारतीयों की तुलना में कहीं अधिक थी।
भारत में आयकर प्रणाली का वास्तविक विस्तार 1922 के आयकर कानून के बाद शुरू हुआ। इसी कानून के तहत आयकर प्रशासन को अधिक संगठित स्वरूप मिला और अधिकारियों को अलग-अलग अधिकार प्रदान किए गए।
इसके बाद 1946 में प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से आयकर अधिकारियों की भर्ती शुरू हुई। वर्ष 1953 में इस सेवा को इंडियन रेवेन्यू सर्विस यानी आईआरएस का नाम दिया गया।
वर्तमान में देश में आयकर अधिनियम 1961 लागू है। समय-समय पर इसमें संशोधन किए जाते रहे हैं। वर्ष 1963 में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड का गठन किया गया, जिसने कर प्रशासन को और अधिक व्यवस्थित बनाया।
आज आयकर केवल सरकारी राजस्व जुटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि देश के विकास, बुनियादी ढांचे, कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। हालांकि इसकी शुरुआत उस दौर में हुई थी, जब 1857 की क्रांति के बाद आर्थिक संकट से जूझ रही ब्रिटिश सरकार को भारतीयों पर पहली बार आयकर लगाने का फैसला करना पड़ा था।
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