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क्रूड ऑयल 111 डॉलर के पार! ट्रंप की वॉर्निंग के बाद हिला ग्लोबल मार्केट, मिडिल ईस्ट में ‘फुल-स्केल’ वॉर का खतरा

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब एक बड़े ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस में बदल चुका है। संयुक्त अरब अमीरात के ‘बराकह न्यूक्लियर पावर प्लांट’ पर हुए ड्रोन हमले और सऊदी अरब की हवाई सीमा में इराक की तरफ से आए 3 संदिग्ध ड्रोन्स को मार गिराए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमतें 2% से ज्यादा उछलकर 111.5 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं, जो पिछले कई महीनों से हाईएस्ट लेवल है।

इसी बीच, दुनिया का सबसे सेंसिटिव ऑयल रूट स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुर्ज़ पिछले 80 दिनों से ऑलमोस्ट चोक है, जिससे वहां जहाजों का मूवमेंट 90% तक ठप हो चुका है। सिचुएशन को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ मिलिट्री ऑप्शन्स पर विचार करने के लिए एक हाई-लेवल मीटिंग बुला रहे हैं। इससे पूरे रीजन में बड़े युद्ध का खतरा मंडराने लगा।

न्यूक्लियर और तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर सीधे हमले


यूएई के बराकह परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर ड्रोन हमले ने वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया है। यूएई ने इसे “आतंकवादी कृत्य” करार देते हुए इसका कड़ा जवाब देने की बात कही है।

सऊदी सुरक्षा बलों ने पुष्टि की है कि उन्होंने अपनी हवाई सीमा में घुस रहे 3 ड्रोन्स को नष्ट कर दिया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि ये हमले सीधे तौर पर अमेरिका और इजरायल को चेतावनी हैं कि यदि ईरान पर कोई कार्रवाई हुई, तो खाड़ी देशों का पूरा तेल और ऊर्जा ढांचा ठप कर दिया जाएगा।

एशियाई देशों का ‘प्लान-बी’


दुनिया का 20% तेल सप्लाई करने वाला ‘होर्मुज मार्ग’ पिछले करीब 3 महीनों से ब्लॉक है, इसलिए भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े तेल आयातक देशों ने एक नई कूटनीतिक रणनीति अपनाई है।

रिपोर्ट के अनुसार, ये देश किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते का इंतजार करने के बजाय ईरान के साथ सीधे ‘द्विपक्षीय बातचीत’ कर रहे हैं। इसका उद्देश्य ओमान और लार्क द्वीप के पास के समुद्री क्षेत्रों से अपने तेल टैंकरों के लिए ‘सुरक्षित पारगमन गलियारे’ सुनिश्चित करना है ताकि युद्ध के बीच भी उनकी ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।

भारत के लिए क्या हैं चिंताएं?


भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए 111 डॉलर प्रति बैरल की यह कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है:

जीडीपी और महंगाई पर मार: मूडीज का अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 90 डॉलर से 110 डॉलर के बीच बनी रहीं, तो भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की जीडीपी ग्रोथ रेट में 0.2% से 0.8% तक की गिरावट आ सकती है। इसके अलावा, माल ढुलाई महंगी होने से देश में पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो सकती हैं।

एक्सपर्ट्स की राय


मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते कड़े रुख को देखते हुए फिलहाल किसी शांति समझौते की उम्मीद बेहद कम है। यदि वाशिंगटन की ओर से कोई सैन्य कदम उठाया जाता है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें बहुत जल्द 120 डॉलर प्रति बैरल का स्तर भी पार कर सकती हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें अमेरिकी राष्ट्रपति के अगले कदम और खाड़ी देशों की सुरक्षा तैयारियों पर टिकी हैं।

news desk

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