मुंबई/नई दिल्ली। ग्लोबल मार्केट में मचे हड़कंप के बीच सोमवार (18 मई) को भारतीय करेंसी को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया (Indian Rupee) इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार मजबूत हो रहे डॉलर के कारण पहली बार एक डॉलर की कीमत 96.23 रुपये के रिकॉर्ड स्तर को छू गई है।
इससे पहले शुक्रवार को बाजार बंद होने पर रुपया 95.97 के स्तर पर था, लेकिन वीकेंड के बाद सोमवार को बाजार खुलते ही निवेशकों ने भारी बिकवाली शुरू कर दी, जिससे रुपया संभल नहीं सका।
भारतीय मुद्रा में आई इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे मुख्य रूप से वैश्विक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं:
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में गहराते भू-राजनीतिक तनाव ने कच्चे तेल के बाजार में आग लगा दी है। वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) 111 डॉलर प्रति बैरल के बेहद खतरनाक स्तर को पार कर चुका है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ेगा, जिसने निवेशकों को चिंता में डाल दिया है।
दुनिया भर की ऊर्जा आपूर्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले ‘होर्मुज स्ट्रेट’ समुद्री मार्ग पर रुकावट की आशंका बनी हुई है। इस रूट पर किसी भी तरह के व्यवधान के डर से ग्लोबल इनवेस्टर्स सुरक्षित निवेश की तलाश में उभरते बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं।
अमेरिका में 10 साल की ट्रेजरी यील्ड (Bond Yield) बढ़कर 4.625% पर पहुंच गई है। वैश्विक निवेशकों को डर है कि दुनिया भर में महंगाई लंबे समय तक बनी रह सकती है, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) ब्याज दरों को सख्त रख सकता है। अमेरिकी बॉन्ड्स में बेहतर रिटर्न मिलने के कारण विदेशी निवेशक भारत जैसे देशों से डॉलर निकाल रहे हैं।
विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है। बाजार के एक्सपर्ट्स का कहना है कि रुपये को 96 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे जाने से रोकने के लिए केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार (15 मई) को भी अप्रत्यक्ष रूप से बाजार में दखल दिया था और डॉलर बेचे थे।
जानकारों की राय
इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि आरबीआई किसी एक निश्चित स्तर को बचाने के लिए जिद नहीं करेगा, बल्कि उसका मुख्य फोकस रुपये में आने वाले अचानक और बड़े उतार-चढ़ाव (Volatility) को नियंत्रित करना है। मौजूदा ग्लोबल सेंटीमेंट्स को देखते हुए गिरावट के इस सिलसिले को तुरंत रोक पाना काफी चुनौतीपूर्ण होगा।
कमजोर रुपया और महंगा कच्चा तेल सीधे तौर पर देश में आयातित महंगाई (Imported Inflation) को बढ़ावा देते हैं:
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