बाजार

5.55 डॉलर प्रति पाउंड पर पहुंचा कॉपर! आखिर क्यों 2025 बन गया ‘रेड मेटल’ के लिए ऐतिहासिक साल ?

कॉपर को ग्लोबल इकॉनमी का “डॉक्टर” कहा जाता। जब कॉपर की कीमतें चढ़ती हैं, तो समझ लीजिए कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में कहीं न कहीं हलचल तेज़ है। साल 2025 में कॉपर ने यही संकेत देते हुए रिकॉर्ड स्तर छू लिए हैं। ऐसा तब हो रहा है जबकि चीन में डिमांड कम हुआ है जोकि वैश्वक डिमांड की 50% तक खपत के लिए अकेले जिम्मेदार है। फिलहाल कॉपर की कीमत करीब 5.55 अमेरिकी डॉलर प्रति पाउंड यानी लगभग 12,235 डॉलर प्रति टन के आसपास चल रही है। सिर्फ एक दिन में इसमें करीब 0.74 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है। अगर पूरे साल की बात करें, तो यह तेजी और भी बड़ी नजर आती है।

लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर की कीमतें 2025 में 12,000 डॉलर प्रति टन से ऊपर निकल चुकी हैं। 23 दिसंबर 2025 को यह 12,159.50 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई, जो साल की शुरुआत से अब तक करीब 38 फीसदी की बढ़ोतरी है। यह 2009 के बाद कॉपर का सबसे बड़ा सालाना उछाल माना जा रहा है। वहीं अमेरिकी बाजार COMEX में कॉपर फ्यूचर्स करीब 5.56 डॉलर प्रति पाउंड के आसपास ट्रेड कर रहे हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह तेजी अचानक नहीं आई है, बल्कि इसके पीछे कई बड़े फैक्टर एक साथ काम कर रहे हैं।

सप्लाई टाइट, डिमांड मजबूत: क्यों चढ़ रहे हैं दाम ?

कॉपर की सप्लाई इस वक्त सबसे बड़ा सवाल बनी हुई है। इंडोनेशिया की ग्रासबर्ग जैसी बड़ी खदानों में रुकावटें आई हैं, चिली और पेरू जैसे देशों में उत्पादन प्रभावित हुआ है और नई खदानें जरूरत के हिसाब से तेजी से शुरू नहीं हो पा रही हैं। ऊपर से अमेरिका में संभावित टैरिफ के डर से पहले ही बड़े पैमाने पर स्टॉकपाइलिंग की गई, जिससे ग्लोबल सप्लाई और तंग हो गई। दूसरी तरफ मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, एआई से जुड़े डेटा सेंटर्स, पावर ग्रिड और सोलर-विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स कॉपर की खपत को नई ऊंचाई पर ले जा रहे हैं।

कहां-कहां होता है सबसे ज्यादा इस्तेमाल ?

कॉपर बाजार को अगर आसान भाषा में समझें तो इसका सबसे बड़ा इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन, बिजली और ऑटोमोबाइल सेक्टर में होता है। अकेले कंस्ट्रक्शन सेक्टर करीब 40 फीसदी कॉपर खपा जाता है। घरों की वायरिंग, प्लंबिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर हर जगह कॉपर जरूरी है। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स में तो कॉपर की भूमिका और भी बड़ी हो गई है, क्योंकि एक ईवी में पारंपरिक गाड़ी के मुकाबले लगभग तीन गुना ज्यादा कॉपर लगता है। वहीं रिन्यूएबल एनर्जी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर आने वाले वर्षों में इसकी मांग को और बढ़ाने वाले हैं।

निवेशकों के लिए आगे क्या संकेत ?

बड़ी फाइनेंशियल संस्थाएं भी कॉपर को लेकर काफी बुलिश नजर आ रही हैं। गोल्डमैन सैक्स ने दिसंबर 2025 की अपनी रिपोर्ट में 2026 के लिए औसत कीमत का अनुमान बढ़ाकर 11,400 डॉलर प्रति टन कर दिया है, जो पहले 10,650 डॉलर था। उनका मानना है कि लंबी अवधि में कॉपर उनकी पसंदीदा इंडस्ट्रियल मेटल बनी रहेगी, क्योंकि विद्युतीकरण और एनर्जी ट्रांजिशन से इसकी मांग लगातार बढ़ेगी। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि अगर टैरिफ लागू होते हैं, तो 2027 में कीमतें कुछ समय के लिए 10,750 डॉलर तक फिसल सकती हैं, जबकि बुल केस में 15,000 डॉलर प्रति टन तक जाने की संभावना भी जताई गई है।

ब्लूमबर्ग और mining.com की रिपोर्ट्स के मुताबिक 2025 में कॉपर की कीमतें कुल मिलाकर 35 से 40 फीसदी तक बढ़ीं। ब्लूमबर्ग NEF का अनुमान है कि ऊर्जा संक्रमण की वजह से 2045 तक कॉपर की मांग तीन गुना हो सकती है। अमेरिका में ही 8 से 10 लाख टन तक कॉपर स्टॉक होने की बात कही जा रही है, जिसने ग्लोबल बाजार को और टाइट कर दिया है। वर्ल्ड बैंक की कमोडिटी आउटलुक रिपोर्ट भी इशारा करती है कि भले ही बाकी कमोडिटीज पर दबाव रहे, लेकिन कॉपर जैसी धातुओं को एआई और डेटा सेंटर्स से सपोर्ट मिलता रहेगा।

कुल मिलाकर तस्वीर साफ है। कॉपर की मौजूदा तेजी सिर्फ शॉर्ट-टर्म ट्रेंड नहीं लगती। एनर्जी ट्रांजिशन, ईवी, एआई और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ता फोकस इसे लंबे समय तक मांग में बनाए रख सकता है। निवेशकों के लिए यह मौका भी है और चुनौती भी। ईटीएफ, फ्यूचर्स या खनन कंपनियों के शेयर आकर्षक दिखते हैं, लेकिन टैरिफ, चीन की मांग और ग्लोबल ग्रोथ जैसी अनिश्चितताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यानी कॉपर चमक रहा है, लेकिन समझदारी के साथ कदम रखना अभी भी उतना ही जरूरी है।

Gopal Singh

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