वैश्विक बाजारों में बढ़ते तनाव और अमेरिकी आर्थिक नीतियों को लेकर बढ़ी अनिश्चितता का असर बुधवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। कारोबार की शुरुआत से ही निवेशकों ने मुनाफावसूली और बिकवाली का रुख अपनाया, जिससे प्रमुख सूचकांक तेज गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। बीएसई सेंसेक्स करीब 600 अंक टूटकर 76,866 के स्तर पर पहुंच गया, जबकि एनएसई निफ्टी 160 अंक फिसलकर 24,026 के आसपास कारोबार करता दिखा।
बाजार में सबसे अधिक असर फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टर पर देखने को मिला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत समेत अन्य देशों से आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध आयात शुल्क लगाने की घोषणा के बाद निवेशकों में चिंता बढ़ गई। इसका सीधा असर फार्मा कंपनियों के शेयरों पर पड़ा और निफ्टी फार्मा इंडेक्स 1.70% तक लुढ़क गया। ग्लैंड फार्मा, PPL फार्मा, अल्केम लैब्स और ल्यूपिन जैसे प्रमुख शेयरों में 3% तक की गिरावट दर्ज की गई।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच गहराते विवाद के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 92 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। भारत अपनी अधिकांश तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें देश के आयात बिल और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा कंपनियों की लागत बढ़ने से उनके मुनाफे पर भी असर पड़ने की आशंका है, जिससे निवेशकों की चिंता और बढ़ गई।
वैश्विक अनिश्चितता, मजबूत होते अमेरिकी डॉलर और महंगे क्रूड ऑयल के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारतीय बाजार से पूंजी निकाल रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बैंकिंग और आईटी सेक्टर पर देखने को मिला। निफ्टी पीएसयू बैंक इंडेक्स 1.38% और प्राइवेट बैंक इंडेक्स 1.09% तक गिर गया। एसबीआई, एक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक, इंफोसिस और टेक महिंद्रा जैसे बड़े शेयरों में भी दबाव बना रहा।
जहां अधिकांश सेक्टर गिरावट के दबाव में रहे, वहीं ऑटो सेक्टर ने बेहतर प्रदर्शन किया। पहली तिमाही के मजबूत वित्तीय नतीजों के दम पर निफ्टी ऑटो इंडेक्स 0.37% की बढ़त के साथ कारोबार करता नजर आया। टाइटन समेत कई ऑटो कंपनियों के शेयर हरे निशान में रहे, जिससे बाजार को कुछ राहत मिली।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल जियोपॉलिटिकल तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें शेयर बाजार के लिए सबसे बड़े जोखिम बने हुए हैं। हालांकि, उनका यह भी कहना है कि मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों और बैंकिंग सेक्टर के शेयरों में आई यह गिरावट लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बेहतर खरीदारी का अवसर साबित हो सकती है। निवेशकों को जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय अपने निवेश लक्ष्यों और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनानी चाहिए।
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