नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों के बीच विपक्ष ने उन्हें पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात कही है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर कामकाज और मतदाता सूची के आंकड़ों के प्रबंधन को लेकर दो चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इसके बाद विपक्ष की ओर से संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी की बात सामने आई है।
विपक्ष इस मामले में कानूनी विशेषज्ञों की मदद से प्रस्ताव का मसौदा तैयार कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और संसद में महाभियोग प्रस्ताव आने के बाद आगे क्या होता है?
भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं। चुनाव से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में आयोग के सदस्यों की भूमिका होती है। इसी वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संवैधानिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
मीडिया रिपोर्टों में चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों और कामकाज से जुड़ी आपत्तियों का जिक्र सामने आने के बाद विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग उठाई है। हालांकि, किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर पद से नहीं हटाया जा सकता। इसके लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है।
भारत निर्वाचन आयोग का गठन देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए किया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। इसके लिए 2023 के कानून के तहत बनी चयन समिति की सिफारिश महत्वपूर्ण होती है।
इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक सदस्य शामिल होता है। कानून के अनुसार, चुनाव आयुक्त के पद के लिए संबंधित व्यक्ति के पास सरकार में सचिव स्तर के पद पर काम करने का अनुभव होना चाहिए। इसके अलावा ईमानदारी तथा चुनाव प्रबंधन और संचालन का ज्ञान एवं अनुभव भी अपेक्षित है।
चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की आयु तक होता है। इनमें जो भी पहले हो, उसी के आधार पर कार्यकाल समाप्त होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान वेतन और अन्य आर्थिक सुविधाएं मिलती हैं।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। 2023 के कानून की धारा 11(2) में भी यही व्यवस्था दी गई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है। कदाचार में भ्रष्ट आचरण या पद का दुरुपयोग जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं, जबकि अक्षमता का अर्थ अपने संवैधानिक और आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थता से है।
अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों को हटाने के लिए भी मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश जरूरी होती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संसद के किसी सदन में कदाचार या अक्षमता के स्पष्ट आरोपों के साथ प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है। इसे आम तौर पर महाभियोग प्रस्ताव कहा जाता है।
लोकसभा में ऐसा प्रस्ताव पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद आरोपों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच की जाती है।
यदि जांच के बाद मामला आगे बढ़ता है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों से पारित होना जरूरी है। इसके लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
इससे पहले अप्रैल में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दोनों सदनों में पेश किए गए महाभियोग प्रस्तावों को खारिज कर दिया था।
इससे पहले 12 मार्च को लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव पेश करने में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने विपक्ष की अगुवाई की थी। लोकसभा में पेश प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा में पेश प्रस्ताव पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे।
उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण व्यवहार करने के साथ चुनाव में धोखाधड़ी और एसआईआर की जांच में बाधा डालने के आरोप लगाए गए थे। ये आरोप विपक्ष की ओर से लगाए गए थे और प्रस्ताव को बाद में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने खारिज कर दिया था।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था सामान्य पदों से अलग है। किसी आरोप के सामने आने मात्र से उन्हें पद से हटाया नहीं जा सकता। इसके लिए कदाचार या अक्षमता का मामला निर्धारित संसदीय प्रक्रिया से गुजरना होता है और दोनों सदनों में आवश्यक बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है।
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