गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी क्यों नहीं रुकवाई? ये सवाल पिछले कुछ सालों में कई बार अलग अलग मंचों से दोहराया गया है. गांधी जयंती के मौके पर इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए इतिहास की गलियों से गुजरते हुए कई प्रमाण मिले, जो सवाल के उद्देश्य को ही कठघरे में खड़ा करते हैं. आइए यही सवाल 1930 के दशक के भारत से पूछते हैं. इतिहास की किताबें, गांधी जी के पत्र और उस दौर की गवाही क्या कहती है?
23 मार्च 1931 को लाहौर की सड़कों पर आज़ादी का जुनून अपने चरम पर था, जेल की सलाखों के पीछे एक 23 साल का नौजवान ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के नारे के साथ अपने लिए तैयार फांसी के फंदे का इंतज़ार कर रहा है और देश की जनता हर शहर, हर गली के मोड़ पर उसकी जिंदगी के लिए दुआ कर रही थी.
किस जुर्म में दी गई फांसी?
साल 1929 में भारतीय उपमहाद्वीप में गर्मियां परवान चढ़ने लगीं थीं. लेकिन समाज में मौसम से ज्यादा तपिश आजादी की मांग को लेकर बढ़ रही थी. वो 8 अप्रैल का दिन था जब दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बहस चल रही थी. अचानक एक धमाका होता है, धुएं का गुबार उठता है और चारों तरफ अफ़रा-तफ़री मच जाती है. भगदड़ के बीच दो नौजवान निश्चय के साथ खड़े रहते हैं और असेंबली में नारा गूंजता है – ‘इंकलाब ज़िंदाबाद!’
ये घटना भारत से लेकर सात समंदर पार ब्रिटेन तक सनसनी मचा देता है. बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त चाहते तो आसानी से भाग सकते थे, भीड़ में गुम हो सकते थे. लेकिन उन्होंने जानबूझकर गिरफ्तारी दी. उनका उद्देश्य साफ था — औपनिवेशिक सरकार को सीधे चुनौती देना और जनता तक अपने क्रांति के विचारों को पहुंचाना.
गिरफ्तारी के बाद केस की जांच शुरू हुई. उनकी पहचान गवाहों से कराई गई तो जल्द ही उनसे जुड़ा एक पुराना मामला भी सामने आया. इस मामले का तार जुड़ा 1928 की एक घटना से, जब देश के बड़े नेता लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज़ अफ़सर सॉन्डर्स की हत्या की गई थी. इसे ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ कहा गया जो भगत सिंह की ज़िंदगी का अंतिम मुकदमा बना. क्योंकि असेंबली बम धमाके मामले में बटुकेश्वर दत्त तो 1938 में छूट गए थे.
सजा के ऐलान से भड़का जनाक्रोश
पहले गिरफ्तारी, फिर जांच हुई और ट्रायल चला. 7 अक्टूबर 1930 को इस मामले में अदालत ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सज़ा-ए-मौत दी. पहले फांसी 24 मार्च 1931 को मुकर्रर हुई. हालांकि बाद में 23 मार्च को ही फांसी दे दी गई.
कोर्ट के इस फैसले से जनता में तीव्र आक्रोश फैल जाता है. देश की सड़कों पर लोगों का गुस्सा साफ दिख रहा था. जगह-जगह सभाएं होने लगी, पर्चे बांटे जाने लगे, जुलूस निकाले गये. हर तरफ बस यही मांग उठ रही थी कि भगत सिंह की फांसी रोकी जाए. जनाक्रोश देख कर कांग्रेस के भीतर भी भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी की सजा को रोकने की चर्चा होने लगी. पंडित जवाहरलाल नेहरू जेल जाकर भगत सिंह से मुलाकात करते हैं. कांग्रेस ने अपने नेताओं की एक टीम बनाई जो भगत सिंह और उनके साथियों को कानूनी मदद पहुंचा रही थी.
क्या इरविन से गांधी जी ने की थी बात?
भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए सबकी उम्मीदें गांधी जी से थी. गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाने से पहले उनकी तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के साथ कई दौर की मुलाक़ातें हो रही थीं. ऐतिहासिक दस्तावेज़ों से स्पष्ट होता है कि महात्मा गांधी ने अपने स्तर पर भगत सिंह की फांसी रूकवाने के लिए कई बार कोशिशें की थीं. इस मामले में गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच होने वाली वार्ता के अंश हमें ‘महात्मा गांधी के संकलित लेखन, खंड 51, मार्च 1931’ में मिलते हैं.

इसके अलावा गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी को रूकवाने के लिए इरविन को दो बार पत्र भी लिखा. उन्होनें कहा था, ‘यदि आप उन्हें फांसी देंगे, तो आप शांति प्रक्रिया को बहुत क्षति पहुंचाएंगे.’ इस पर इरविन ने गांधी जी को जवाब दिया था कि, ‘मैं सहानुभूति रखता हूं, पर कोर्ट का फैसला अंतिम है. सरकार न्यायिक फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती’. गांधी अपने पत्र में लिखते हैं कि ‘मैंने लॉर्ड इरविन से दिन-रात विनती की कि इन तीनों की जान बचा ली जाए. लेकिन वे अपनी सरकार के सामने असहाय थे.’
इस संदर्भ में इतिहासकार राम पुनियानी अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि ‘वायसराय लॉर्ड इरविन ने अपने फेयरवेल के समय कहा था कि ‘मिस्टर गांधी के फांसी रूकवाने की अपील के बाद मैंने इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया था और ब्रिटेन सरकार से इस विषय पर वार्ता भी की थी. पर ब्रिटिश सरकार इस फैसले पर अडिग थी. पंजाब में पुलिस ऑफि़सर्स ने कहा था कि अगर भगत सिंह की फांसी की सज़ा माफ होती है तो वे सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे देंगें’.
इसके अलावा गांधी जी ने वकील आसफ अली के जरिए भगत सिंह को कहलवाया भी था कि वो एक मर्सी पिटीशन दायर करें. जिसके बाद इरविन पर दवाब बनाया जा सके. फेमस ब्लॉगर मनीष सिंह अपने एक्स पोस्ट पर इस प्रसंग को रोचक तरीके से लिखते हैं ‘”माफीनामा” इर्विन के पास पहुंचा. उन्होंने खोला, पढ़ा, और सर पीट लिया. लिखा था -“हम ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध सिपाही हैं. इसलिए कृपया हमें मामूली अपराधियो की तरह फांसी मत दें. हमें युध्द अपराधी की तरह गोली से उड़ाया जाए.” ये विचित्र माफ़ीनामा भी खबर बना और भगत का लेजेंड हिंदुस्तान के सर चढ़कर बोलने लगा.’
इसका मतलब ये हुआ कि भगत सिंह अगर माफी मांग लेते तो शायद उनकी फांसी रुकवाई जा सकती थी. लेकिन भगत सिंह तो ठहरे भगत सिंह. उन्होने माफी नहीं मांगी.
जब गांधी जी ने लिखा निंदा प्रस्ताव

26 मार्च 1931 के दिन कराची में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू होना था. तभी कुछ लोग आए और गांधी जी के खिलाफ नाराजगी प्रकट करने लगे. जिस पर नेहरू ने उन्हे समझाया. इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसकी ड्राफ्टिंग खुद गांधी जी ने तैयार की थी.
सवाल सिर्फ भगत सिंह की फांसी के मुद्दे का ही नहीं है. महात्मा गांधी को अतीत के कई मुद्दों के लिए कसूरवार ठहराया जाता है. लेकिन जब इतिहास के तत्कालिक दृष्टिकोण से देखते हैं तो आज के सवाल, राजनीतिक ज्यादा लगते हैं.