पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच चल रहा लंबा सैन्य तनाव अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि दुनिया के नक्शे पर एक और भीषण युद्ध की सुगबुगाहट तेज हो गई है। खुफिया रिपोर्टों और सुरक्षा विशेषज्ञों के हवाले से सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि चीन ने ताइवान की चौतरफा घेराबंदी को अब स्थायी रूप दे दिया है। बीजिंग का यह कदम किसी अस्थायी सैन्य अभ्यास का हिस्सा नहीं, बल्कि ताइवान को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेने की एक सोची-समझी युद्ध नीति है।
सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी ने ताइवान स्ट्रेट और उसके आसपास के समुद्री क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति को धीरे-धीरे एक सोचे-समझे पैटर्न के तहत बढ़ाया है:
साल 2020: “ताइवान जलडमरूमध्य” में चीन का केवल 1 युद्धपोत नियमित गश्त पर रहता था, जबकि दो अन्य जहाज उत्तर और दक्षिणी तटों की निगरानी करते थे।
साल 2022: अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद, चीन ने ताइवान के पूर्वी तट पर चौथे युद्धपोत की स्थायी तैनाती कर द्वीप को 360-डिग्री घेरने की शुरुआत की।
साल 2026: अब इस घेरे में 5वें और 6ठें मॉडर्न वॉरशिप को भी स्थायी तौर पर शामिल कर लिया गया है। यानी अब हर वक्त 5 से 6 चीनी गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स ताइवान को चारों तरफ से घेरे रखते हैं।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह कदम सिर्फ ताइवान को डराने के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन बड़े सामरिक उद्देश्य छिपे हैं:
भारी और अत्याधुनिक हथियारों की तैनाती
पहले चीन इस क्षेत्र में गश्त के लिए छोटे जहाजों या तटरक्षक बल “Coast Guard” का उपयोग करता था। लेकिन अब उनकी जगह चीन ने अपने सबसे घातक गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स तैनात कर दिए हैं, जो हवा और पानी में लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से लैस हैं और किसी भी समय पूर्ण-स्तरीय युद्ध शुरू कर सकते हैं
समुद्र की गहराई की मैपिंग और खुफिया निगरानी
ताइवान का पूर्वी तट गहरा समुद्री इलाका है। चीनी युद्धपोत वहां लगातार डटे रहकर समुद्र की गहराई और वहां के भूगोल का डिजिटल नक्शा तैयार कर रहे हैं। इसका सीधा मकसद यह है कि भविष्य में युद्ध के दौरान यदि अमेरिकी या ताइवानी पनडुब्बियां वहां छिपने की कोशिश करें, तो चीन के पास उनका सटीक डेटा पहले से मौजूद हो।
‘एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल’
ताइवान के पूर्वी हिस्से में ‘हुअलिएन’ और ‘ताइतुंग’ जैसे बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मिलिट्री एयरबेस मौजूद हैं। चीन ठीक इन्हीं एयरबेसों के सामने अपने युद्धपोतों को खड़ा रखकर एक ऐसी दीवार बना रहा है, जिससे युद्ध की स्थिति में अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स या परमाणु पनडुब्बियों को ताइवान की मदद के लिए करीब आने से रोका जा सके।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन यहाँ ‘ग्रे-ज़ोन वॉरफेयर’ और ‘एनाकोंडा स्ट्रेटजी’ का इस्तेमाल कर रहा है। इसका मतलब है कि बिना कोई सीधी गोली चलाए या बिना युद्ध की घोषणा किए, ताइवान पर आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबाव इतना बढ़ा दिया जाए कि उसका दम घुटने लगे और वह बिना लड़े ही घुटने टेक दे अब जब वैश्विक महाशक्तियों का ध्यान मध्य-पूर्व के संकट से हटा है, तो पूर्वी एशिया का यह क्षेत्र इस समय दुनिया का सबसे बड़ा बारूदी ढेर बन चुका है।
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