भाभारत के कई गांवों में गर्भवती होना सिर्फ खुशखबरी नहीं होता, बल्कि यह महिलाओं के लिए संघर्ष का दौर भी बन जाता है।। एक ओर घर में नए सदस्य के आने की उम्मीद होती है, तो दूसरी ओर शरीर में ऐसी कमजोरी घर कर जाती है जिसे “थकान” कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन यह मामूली थकान नहीं, बल्कि खून की कमी यानी एनीमिया का संकेत होती है।
एनीमिया भारत में गर्भवती महिलाओं की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के मुताबिक देश में हर दूसरी गर्भवती महिला खून की कमी से प्रभावित है। यह आंकड़ा भले ही पिछले वर्षों की तुलना में थोड़ा सुधरा हो, लेकिन स्थिति अब भी बेहद गंभीर बनी हुई है। भारत में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर कहीं ज्यादा है।
इसका असर सिर्फ मां की सेहत तक सीमित नहीं रहता। एनीमिया गर्भावस्था को जोखिम भरा बना देता है। प्रसव के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग , समय से पहले बच्चे का जन्म और नवजात का कम वजन, ये सभी खतरे खून की कमी से सीधे जुड़े हैं। ऐसे बच्चे आगे चलकर बीमारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं और उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर भी असर पड़ता है।
कुछ राज्यों में हालात और चिंताजनक हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में एनीमिया की समस्या बेहद गहरी है, जहां छह में से चार गर्भवती महिलाएं इससे जूझ रही हैं। गरीब और वंचित तबकों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, जहां पोषणयुक्त भोजन, स्वास्थ्य जांच और दवाओं तक पहुंच सीमित है।
एनीमिया कोई अचानक होने वाली बीमारी नहीं, बल्कि लंबे समय तक अनदेखी का नतीजा है। समय पर जांच, आयरन युक्त आहार, सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की सही पहुंच और जागरूकता से इसे काफी हद तक रोका जा सकता है। अगर गर्भवती मां स्वस्थ होगी, तभी आने वाली पीढ़ी भी मजबूत और सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ पाएगी।