हम अक्सर सोचते हैं कि सात समंदर पार होने वाली घटनाओं का हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी से क्या लेना-देना? लेकिन भूगोल की दुनिया आपस में कुछ इस कदर जुड़ी है कि प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के पानी में होने वाली जरा सी हलचल भी भारत के अमरोहा से लेकर अहमदाबाद तक के लोगों को पसीने-पसीने कर देती है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार सिर्फ ‘एल नीनो’ (El Nino) नहीं, बल्कि ‘सुपर एल नीनो’ दस्तक दे रहा है, जो गर्मी के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकता है।
आइए बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरा माजरा क्या है और इस बार भारत के लिए चिंता की बात क्यों है।
‘छोटा बच्चा’ जो भारत में लाता है आफत
स्पैनिश भाषा में ‘एल नीनो’ का सीधा सा मतलब होता है— ‘छोटा लड़का’ या ‘बालक’। दरअसल, दक्षिण अमेरिका के अधिकांश हिस्सों पर लंबे समय तक स्पेन का शासन रहा, इसलिए वहां की स्थानीय भाषा के आधार पर इस मौसमी बदलाव का नामकरण हुआ।
देखा जाए तो यह ‘बालक’ हर 2 से 7 साल में एक बार प्रशांत महासागर में लौटता है। लेकिन विडंबना देखिए, यह जब भी आता है, अपने साथ खेल-कूद नहीं बल्कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में सूखा और भयानक गर्मी लेकर आता है।
तो… अमेरिका के पानी से भारत में गर्मी क्यों?
अगर आप दुनिया के गोल नक्शे को ध्यान से देखें, तो ऑस्ट्रेलिया और एशिया के ठीक आगे बढ़ने पर दक्षिण अमेरिका का पेरू और इक्वाडोर जैसा इलाका आता है। इनके बीच में फैला हुआ है विशाल प्रशांत महासागर।
सामान्य दिनों में: पूर्व से पश्चिम की तरफ चलने वाली तेज हवाएं (ट्रेड विंड्स) समुद्र के गर्म पानी को एशिया (इंडोनेशिया-फिलीपींस) की तरफ धकेलती रहती हैं। इस वजह से दक्षिण अमेरिका के पास ठंडा पानी ऊपर आता है और वहां का मौसम संतुलित रहता है।
एल नीनो के दिनों में: अचानक ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। नतीजा यह होता है कि जो गर्म पानी एशिया की तरफ आना चाहिए था, वह वापस दक्षिण अमेरिका की ओर बहने लगता है। देखते ही देखते पूरा प्रशांत महासागर असामान्य रूप से गर्म हो जाता है।
जब मॉनसून का रास्ता ‘भटक’ जाता है
जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, तो हवाएं और बादल वहीं पर बनने लगते हैं और दक्षिण अमेरिका के इलाकों में मूसलाधार बारिश करा देते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू भारत के लिए दर्दनाक होता है।
भारत का मॉनसून दक्षिण-पश्चिम हवाओं (अरब सागर और हिंद महासागर की नमी) के भरोसे चलता है। एल नीनो के कारण हवा का यह ग्लोबल पैटर्न पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। भारत की तरफ आने वाली नमी से भरी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं।
असर: आसमान साफ रहता है, बादल गायब हो जाते हैं और अप्रैल से जून के बीच सूरज की किरणें सीधे जमीन को झुलसाने लगती हैं। उत्तर भारत, दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश और यूपी जैसे राज्यों में तापमान 45 से 48 डिग्री तक पहुंच जाता है, जैसा हमने कुछ साल पहले 2023 में भी देखा था।
‘सुपर एल नीनो’: छोटे मियां अब बन चुके हैं ‘दैत्य’
अब बात करते हैं मौजूदा स्थिति की, जिसने वैज्ञानिकों के माथे पर बल ला दिए हैं। इस बार यह सामान्य एल नीनो नहीं, बल्कि ‘सुपर एल नीनो’ की शक्ल ले रहा है।
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, जब मध्य प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाता है, तो उसे ‘सुपर एल नीनो’ कहते हैं। फिलहाल, वहां का साप्ताहिक तापमान +0.9 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है और समुद्र के नीचे गर्म पानी का एक विशाल भंडार पिछले 6 महीनों से लगातार सुलग रहा है।
1950 के बाद से इतिहास में ऐसा बहुत कम बार हुआ है…
- 1982
- 1997
- 2015
इन तीनों ही सालों में दुनिया ने मौसम का सबसे क्रूर चेहरा देखा था। इस साल का खतरा इसलिए बड़ा है क्योंकि पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण धरती तप रही है, ऊपर से यह सुपर एल नीनो आग में घी का काम करने आ रहा है। कुछ एक्सपर्ट्स का तो यहां तक मानना है कि यह पिछले 150 सालों का सबसे ताकतवर एल नीनो साबित हो सकता है।
भारत पर क्या होगा इसका सीधा असर?
- कमजोर मॉनसून और सूखा: यदि सुपर एल नीनो पूरी तरह हावी हुआ, तो देश में बारिश का कोटा काफी कम रह सकता है, जिससे फसलों पर सीधा असर पड़ेगा।
- लम्बी और जानलेवा हीटवेव: उत्तर, मध्य और पश्चिमी भारत में लू (Heatwave) के दिन बढ़ जाएंगे। रातें भी उतनी ही गर्म होंगी जितने दिन।
- जल संकट: बांधों और जलाशयों का पानी तेजी से सूखेगा, जिससे बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा।
संक्षेप में कहें तो ‘छोटे मियां’ नाम का यह चक्रवात अब बेहद बड़ा और आक्रामक हो चुका है। अगर प्रकृति ने जल्द ही अपनी चाल नहीं बदली, तो आने वाले महीने देश के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं।