नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद भी कांग्रेस पीछे हटने को तैयार नहीं है. पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि यह सिर्फ राजनीतिक हार का मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल है. शनिवार को पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर हुई बैठक में राहुल गांधी ने दावा किया कि बिहार के नतीजे “अविश्वसनीय” हैं और जल्द ही पार्टी ठोस सबूत पेश करेगी. कांग्रेस के अनुसार, यह लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की है..
चुनावी प्रक्रिया पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सवाल
बिहार में महागठबंधन के हिस्से के रूप में 61 सीटों पर लड़ते हुए कांग्रेस मात्र 6 सीटें जीत सकी—2020 के 19 सीटों के मुकाबले यह बेहद खराब प्रदर्शन रहा. वोट शेयर भी घटकर करीब 5% रह गया, जबकि एनडीए 202 सीटों के साथ ऐतिहासिक बढ़त हासिल कर गया. कांग्रेस का आरोप है कि SIR के नाम पर लाखों वोट काटे गए और करीब 3 लाख नए वोटर जोड़े गए, जिससे चुनाव असमान हो गया. के.सी. वेणुगोपाल ने कहा, “इतना एकतरफा नतीजा भारतीय इतिहास में नहीं देखा गया. यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी.”
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग ने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन करने वाली घटनाओं पर कार्रवाई नहीं की. उदाहरण के तौर पर, बिहार सरकार ने MCC के दौरान भी ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत 10,000 रुपये की राशि तीन बार ट्रांसफर की—जिसका स्पष्ट उद्देश्य वोट प्रभावित करना था. CPI(ML) के दीपंकर भट्टाचार्य, अशोक गहलोत और कन्हैया कुमार सहित कई नेताओं ने ईसीआई पर “एनडीए के साथ मिलीभगत” का आरोप लगाया है.
कांग्रेस ने पूरे राज्य से डेटा जुटाना शुरू कर दिया है और दो हफ्तों में सबूत पेश करने का दावा किया है. पार्टी का कहना है कि यह लड़ाई लोकतंत्र बचाने की है, न कि हार छिपाने की. आने वाले दिनों में कांग्रेस की रणनीति और विपक्ष की एकता इस मामले को और बड़ा मुद्दा बना सकती है.