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RTI के दायरे से पूरी तरह बाहर हुआ BCCI, CIC ने पलटा अपना ही 8 साल पुराना आर्डर

news desk
Last updated: May 18, 2026 4:47 pm
news desk
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भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड BCCI ने अपनी प्रशासनिक और वित्तीय स्वतंत्रता की कानूनी लड़ाई में अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल की है। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि बीसीसीआई आरटीआई RTI यानी सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत कोई पब्लिक अथॉरिटी नहीं है।

Contents
क्या था पूरा मामला और कैसे बदला फैसला?3 बड़े कानूनी आधारों पर मिली बीसीसीआई को छूट?नए ‘नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025’ का असरCIC की टिप्पणी

इस फैसले की सबसे बड़ी बात यह है कि सूचना आयोग ने साल 2018 के अपने ही उस चर्चित आदेश को पूरी तरह पलट दिया है, जिसके तहत क्रिकेट बोर्ड को आरटीआई के दायरे में लाया गया था। इस नए आदेश के बाद अब आम जनता कानूनी अधिकार के रूप में आरटीआई डालकर बीसीसीआई से उसकी अंदरूनी कार्यप्रणाली, वित्तीय लेनदेन या टीम सिलेक्शन को लेकर सवाल नहीं पूछ सकेगी।

क्या था पूरा मामला और कैसे बदला फैसला?


इस पूरे विवाद की शुरुआत साल 2017 में दिल्ली की रहने वाली गीता रानी की एक आरटीआई याचिका से हुई थी। उन्होंने खेल मंत्रालय से पूछा था कि बीसीसीआई किस नियम के तहत अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए ‘टीम इंडिया’ का चयन करता है और खिलाड़ियों की जर्सी पर ‘INDIA’ लिखने का कानूनी आधार क्या है?

इस केस की सुनवाई में अक्टूबर 2018 में तत्कालीन चीफ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर की बेंच ने कहा था कि BCCI देश को रिप्रेजेंटेशन करता है और इसके जरिए वह काफी लोकप्रियता और संपत्ति कमाता है, इसलिए इसे जनता के प्रति पूरी तरह जवाबदेह होना चाहिए।

हालांकि, बीसीसीआई ने इस फैसले को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। लंबी कानूनी बहस के बाद, सितंबर 2025 में मद्रास हाई कोर्ट ने मामले को वापस सीआईसी के पास नए सिरे से विचार करने के लिए भेज दिया था। अब, सूचना आयुक्त पी. आर. रमेश की एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और नए कानूनों को आधार बनाकर बीसीसीआई के पक्ष में अंतिम मुहर लगा दी है।

3 बड़े कानूनी आधारों पर मिली बीसीसीआई को छूट?


CIC ने अपने आदेश में उन तकनीकी और कानूनी कारणों को स्पष्ट किया है, जिनकी वजह से बीसीसीआई पर आरटीआई लागू नहीं हो सकता:

RTI की धारा 2(h) पर खरा नहीं उतरता बोर्ड: कानून के अनुसार, कोई संस्था ‘पब्लिक अथॉरिटी’ तब बनती है जब वह संविधान, संसद के कानून या सरकारी अधिसूचना से बनी हो, या फिर उसे सरकार से भारी फंडिंग मिलती हो। बीसीसीआई ‘तमिलनाडु सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम’ के तहत रजिस्टर्ड एक स्वतंत्र और निजी संस्था है, जिसे सरकार से कोई पैसा नहीं मिलता।

टैक्स छूट ‘सरकारी फंडिंग’ नहीं: आयोग ने साफ किया कि सरकार द्वारा खेल संघों को दी जाने वाली टैक्स छूट या रियायतों को आरटीआई एक्ट के तहत “सब्स्टेंशियल फाइनेंसिंग” नहीं माना जा सकता।

‘पब्लिक फंक्शन’ बनाम ‘पब्लिक अथॉरिटी’ का अंतर: सीआईसी ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ज़ी टेलीफिल्म्स (2005) केस का हवाला देते हुए कहा कि भले ही बीसीसीआई देश में क्रिकेट का संचालन करने जैसा ‘सार्वजनिक काम’ करता है, लेकिन सिर्फ इस आधार पर उसे ‘सरकारी निकाय’ नहीं माना जा सकता।

नए ‘नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025’ का असर


इस फैसले में हाल ही में पारित हुए नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025 की भी अहम भूमिका रही। इस नए कानून के तहत भी केवल उन्हीं खेल एसोसिएशन्स (NSFs) को आरटीआई के दायरे में रखा गया है जो सरकार से वित्तीय मदद लेते हैं। चूंकि दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड पूरी तरह आत्मनिर्भर है और सरकार से कोई ग्रांट नहीं लेता, इसलिए यह इस नए कानून के दायरे से भी बाहर सुरक्षित निकल गया।

CIC की टिप्पणी


आयोग ने अपने फैसले में एक अहम बात कही “उन्होंने कहा कि BCCI आज ग्लोबल क्रिकेट का फाइनेंशियल हब बन चुका है, जिसकी नींव इंडियन मार्केट और IPL की सक्सेस पर टिकी है। ऐसे में इस संस्था पर जबरदस्ती सरकारी कंट्रोल लगाना इसके सफल इकोनॉमिक सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है”।

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