नई दिल्ली: लोकसभा में महिला आरक्षण कानून को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव के लिए लाया गया संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 वोटिंग में गिर गया। आंकड़े चौंकाने वाले रहे—298 सांसद पक्ष में और 230 विरोध में, लेकिन फिर भी बिल पास नहीं हो सका।
कारण साफ है: संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा करीब 352 होता है, और सरकार उससे काफी पीछे रह गई।
क्या हुआ संसद में?
लोकसभा स्पीकर Om Birla ने डिवीजन के बाद नतीजे घोषित किए। कुल 528 सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा लिया और एक भी सदस्य तटस्थ नहीं रहा। माहौल बेहद गर्म रहा और सत्ता-पक्ष व विपक्ष आमने-सामने दिखे।
सरकार क्या चाहती थी?
प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृह मंत्री Amit Shah ने इसे “महिलाओं के सशक्तिकरण का ऐतिहासिक मौका” बताया। सरकार इस संशोधन के जरिए:
- लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर करीब 850 करना चाहती थी
- महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करना
- नई जनगणना और परिसीमन के आधार पर आरक्षण लागू करना
- दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में भी दायरा बढ़ाना
सरकार का दावा था कि इससे किसी क्षेत्र, खासकर दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व पर असर नहीं पड़ेगा।
विपक्ष क्यों अड़ा?
विपक्ष, खासकर Rahul Gandhi और INDIA गठबंधन ने इस बिल का जोरदार विरोध किया। उनके मुख्य तर्क थे:
- यह जातीय जनगणना के मुद्दे को टालने की कोशिश है
- उत्तर-दक्षिण के बीच राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है
- 2029 तक इंतजार क्यों? अभी की 543 सीटों पर ही 33% आरक्षण लागू किया जाए
विपक्ष ने इसे “राजनीतिक रणनीति” बताया, न कि महिलाओं को तुरंत लाभ देने वाला कदम।
बड़ा सवाल: अब आगे क्या?
दिलचस्प बात ये है कि 2023 में यही महिला आरक्षण बिल भारी बहुमत (454-2) से पास हुआ था। लेकिन उसे लागू करने के लिए जरूरी संशोधन अब राजनीतिक मतभेद में फंस गया है।
इस हार के बाद सरकार के सामने दो रास्ते हैं—या तो नया फॉर्मूला लाए या विपक्ष के साथ सहमति बनाने की कोशिश करे।
महिला आरक्षण पर देश की राजनीति एक बार फिर दो धड़ों में बंट गई है। वोट तो सरकार के पक्ष में ज्यादा आए, लेकिन संविधान के नियमों ने रास्ता रोक दिया। अब नजर इस पर है कि क्या संसद में इस मुद्दे पर कोई नया समाधान निकल पाएगा या यह मामला आगे भी अटका रहेगा।