28 फरवरी को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद युद्ध में ईरान मुश्किल में नजर आ रहा था। कई लोगों ने मान लिया था कि अमेरिका और इजरायल मिलकर उसे पूरी तरह तबाह कर देंगे।
ईरान को घुटनों पर लाने के लिए खतरनाक बमों का इस्तेमाल किया गया और उसके ठिकानों पर जोरदार बमबारी की गई। उसके शीर्ष नेतृत्व को भी निशाना बनाया गया। अमेरिका और इजरायल ने दावा किया कि ईरान की सैन्य ताकत को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।
दूसरी तरफ, डोनाल्ड ट्रंप के बयान लगातार बदलते रहे हैं। उनकी बातों से अब यह संकेत मिल रहा है कि वह ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। दरअसल, ईरान का पलटवार अमेरिका के लिए चिंता का कारण बन गया है।
ट्रंप कई बार ईरान को लेकर बड़े दावे कर चुके हैं, लेकिन अब ईरानी मिसाइल हमले उनके लिए नई चुनौती बन गए हैं। इन हमलों से बचाव का कोई स्पष्ट विकल्प नजर नहीं आ रहा है।
अगर मौजूदा हालात देखें तो युद्ध के 34वें दिन तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। ईरान लगातार इजरायल पर हमले कर रहा है और उसके कई अहम ठिकानों को निशाना बना रहा है।
ट्रंप की मंशा बमबारी के जरिए ईरान को पूरी तरह तबाह करने की बताई जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई दे रही है। ईरान लगातार अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी हमले कर रहा है।
अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर बहस तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर अमेरिका इस संघर्ष में क्यों कूदा। ट्रंप के धुर विरोधी और कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूजॉम का कहना है कि ट्रंप के पास इस युद्ध से बाहर निकलने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है।
‘होर्मुज’ और ‘3 हफ्ते’ वाले बयान के पीछे की हकीकत
ईरान के साथ जारी भीषण युद्ध के 34वें दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र को संबोधित किया। ट्रंप का यह संबोधन ऐसे समय में आया है जब घरेलू मोर्चे पर युद्ध के खर्च और तेल की कीमतों को लेकर उन पर दबाव बढ़ रहा है। हालांकि ट्रंप ने इस युद्ध को ‘भविष्य के लिए निवेश’ बताया, लेकिन उनके बयानों में छिपी रणनीतिक तब्दीली ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
- “अगर युद्ध नहीं करते, तो भविष्य सुरक्षित नहीं था” : संबोधन के दौरान ट्रंप ने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए अमेरिकी नागरिकों को भरोसा दिलाया कि ईरान के खिलाफ यह सैन्य कार्रवाई कोई शौक नहीं, बल्कि मजबूरी थी। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए इस ‘खतरनाक दुश्मन’ की कमर तोड़ना जरूरी था। जानकारों का मानना है कि ट्रंप देश में बढ़ रहे युद्ध-विरोधी असंतोष को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं।
- ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से किनारा और जेडी वेंस का विरोधाभास : ट्रंप ने अपने ताजा बयान में चौंकाने वाली बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका का होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से कोई लेना-देना नहीं है और वह वहां प्रवेश नहीं करेगा।
रणनीतिक बदलाव: जहां ट्रंप इस रास्ते से दूरी बना रहे हैं, वहीं उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस समझौते के तहत सबसे पहले ‘होर्मुज’ को खोलने की वकालत कर रहे हैं।
मतभेद या रणनीति: प्रशासन के भीतर इन अलग-अलग बयानों को विशेषज्ञ अमेरिका की ‘एग्जिट पॉलिसी’ (Exit Policy) के रूप में देख रहे हैं।
- तख्तापलट का इरादा छोड़ा? अब 3 हफ्ते की डेडलाइन : युद्ध की शुरुआत में ट्रंप का मुख्य उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) या तख्तापलट करना था। लेकिन अब उनके सुर बदल गए हैं
नया लक्ष्य: ट्रंप ने अब केवल 3 हफ्ते और युद्ध जारी रखने की बात कही है
विवादास्पद बयान: उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान को “पाषाण युग” (Stone Age) में भेज देगा। विशेषज्ञों की राय: रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि तख्तापलट के लक्ष्य से पीछे हटकर ‘पाषाण युग’ की बात करना ट्रंप की झुंझलाहट को दर्शाता है। यह संकेत है कि अमेरिका अब इस लंबी खिंचती जंग को जल्द से जल्द खत्म करना चाहता है।
क्या वाकई घुटनों पर है महाशक्ति?
युद्ध के 34 दिनों बाद भी निर्णायक जीत न मिल पाना और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों का $105 के पार जाना अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। ट्रंप का 3 हफ्ते की समयसीमा तय करना यह बताता है कि अमेरिका अब इस मोर्चे से सम्मानजनक विदाई (Honorable Exit) का रास्ता तलाश रहा है।
बड़ी बात: “तख्तापलट के दावे से लेकर 3 हफ्ते की डेडलाइन तक का सफर यह बताता है कि ईरान ने अमेरिका को उम्मीद से कहीं ज्यादा कड़ी टक्कर दी है।”