भारत के पहले सौर मिशन Aditya-L1 ने एक ऐसी दिलचस्प खोज की है, जिसने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया है। 10 मई 2024 और 10 अक्टूबर 2024 को आए दो बड़े सौर तूफानों के दौरान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में असामान्य बदलाव दर्ज किए गए। ये दोनों घटनाएं सौर चक्र 25 के चरम चरण में हुईं और इनके असर से पृथ्वी पर जबरदस्त चुंबकीय गड़बड़ी देखने को मिली। यहां तक कि ऑरोरा (उत्तरी रोशनी) भी सामान्य से कहीं निचले अक्षांशों तक दिखाई दी।
आमतौर पर जब सूर्य से आने वाली चार्ज्ड कणों की धारा, यानी सौर हवा, अचानक तेज होती है तो पृथ्वी के निचले इलाकों में चुंबकीय क्षेत्र में पॉजिटिव गड़बड़ी दर्ज होती है। और जब दबाव कम होता है, तो नेगेटिव बदलाव देखने को मिलता है। लेकिन इन दोनों तूफानों में मामला कुछ अलग ही निकला।
क्या था असामान्य व्यवहार?
10 मई 2024 को जब सौर हवा का दबाव तेजी से बढ़ा, तो ज्यादातर निचले अक्षांश वाले इलाकों में पॉजिटिव चुंबकीय गड़बड़ी दर्ज हुई। लेकिन सुबह की दिशा यानी डॉन सेक्टर में स्थित स्टेशनों पर उल्टा नेगेटिव बदलाव दिखा।
ठीक ऐसा ही 10 अक्टूबर 2024 को भी हुआ। उस दिन सौर हवा का दबाव घटा, तो अधिकतर जगहों पर नेगेटिव गड़बड़ी दर्ज हुई, लेकिन सुबह वाले हिस्से में पॉजिटिव बदलाव देखा गया। यह पैटर्न बाकी समय क्षेत्रों में नहीं दिखा, जिससे वैज्ञानिकों की उत्सुकता और बढ़ गई।
क्यों हुआ ऐसा?
पृथ्वी का चुंबकीय कवच, जिसे मैग्नेटोस्फीयर कहा जाता है, हमें सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाता है। लेकिन इन बेहद शक्तिशाली सौर तूफानों के दौरान यह कवच काफी दब गया। इसके कारण एक खास तरह की स्पेस करंट, जो आमतौर पर ध्रुवीय इलाकों तक सीमित रहती है, निचले अक्षांशों तक फैल गई—खासकर सुबह वाले हिस्से में। यही वजह बनी इन असामान्य चुंबकीय बदलावों की।
इस खोज में Indian Institute of Geomagnetism (IIG), मुंबई और Indian Space Research Organisation (ISRO) के वैज्ञानिकों की अहम भूमिका रही। एल1 (लैग्रेंज पॉइंट 1) पर स्थित आदित्य-एल1 ने सूर्य से आने वाले कणों और चुंबकीय क्षेत्रों का डेटा जुटाया, जिसे धरती पर मौजूद ग्राउंड स्टेशनों के आंकड़ों से जोड़कर विश्लेषण किया गया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे तीव्र सौर तूफान उपग्रहों, जीपीएस नेविगेशन सिस्टम और बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि इन घटनाओं को समझना बेहद जरूरी है। यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल Geophysical Research Letters में प्रकाशित हुआ है।
कुल मिलाकर, आदित्य-एल1 की यह खोज दिखाती है कि भारत अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में लगातार मजबूत कदम बढ़ा रहा है और भविष्य में सौर तूफानों की बेहतर भविष्यवाणी में यह मिशन अहम भूमिका निभा सकता है।