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राफेल डील: मोदी सरकार के लिए महंगी पड़ी? अरबों खर्च के बाद भी फ्रांस पर निर्भरता

news desk
Last updated: January 15, 2026 5:30 pm
news desk
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भारत और फ्रांस के बीच राफेल फाइटर जेट को लेकर एक बार फिर बड़ी डील की चर्चा तेज़ हो गई है। इस संभावित सौदे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इस डील से भारत को क्या फायदा होने वाला है।

मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से खबर है कि रक्षा मंत्रालय 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की डील करने की तैयारी कर रहा है। इस सौदे को लेकर भारत और फ्रांस के बीच बातचीत शुरू हो चुकी है। 3.25 लाख करोड़ रुपये की यह डील करीब 36 बिलियन डॉलर आंकी जा रही है।

इस प्रस्तावित डील को लेकर एक बार फिर वही पुराना सवाल सामने आ रहा है कि इतनी महंगी खरीद की जरूरत आखिर क्यों है, जबकि भारत के पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं। इसे लेकर विपक्ष ने मोदी सरकार पर हमला तेज़ कर दिया है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सिर्फ टेक्नोलॉजी के नाम पर इतनी बड़ी और महंगी डील करना सही फैसला होगा।

आम भाषा में समझें तो भारत फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की योजना पर काम कर रहा है। अहम बात यह है कि ये वही राफेल विमान हैं, जिन्हें पहले 36 की संख्या में खरीदा गया था। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार संख्या भी कहीं ज्यादा है और कीमत भी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस डील में विमानों के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से की सप्लाई फ्रांस से होगी, जबकि सिर्फ करीब 30 प्रतिशत हिस्सा ही स्वदेशी होगा। इसके अलावा, राफेल का सोर्स कोड पूरी तरह फ्रांस के पास ही रहेगा। इतना ही नहीं, इस डील के तहत अतिरिक्त टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की संभावना भी बेहद सीमित बताई जा रही है।

दरअसल, भारतीय वायुसेना इस समय गंभीर संकट से गुजर रही है। यह संकट है फाइटर जेट स्क्वाड्रनों की भारी कमी का। इसी कमी को पूरा करने के लिए सरकार तेजी से नए लड़ाकू विमानों की खरीद पर विचार कर रही है, जिसमें राफेल डील को अहम माना जा रहा है।

अगर भारत की मौजूदा स्थिति की बात करें तो इस वक्त वायुसेना के पास केवल करीब 30 स्क्वाड्रन ही उपलब्ध हैं, जबकि मिग-21 और मिग-27 जैसे पुराने विमान रिटायर हो चुके हैं या जल्द ही रिटायर होने वाले हैं। पाकिस्तान और चीन जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए वायुसेना के पास कम से कम 42 फाइटर स्क्वाड्रन होना जरूरी है।

अब आपके जहन में सवाल उठ सकता है कि नई 114 राफेल डील में फर्क क्या है। दरअसल, इस बार सबसे बड़ा फर्क संख्या का है—पहले 36 विमान खरीदे गए थे, जबकि अब संख्या बढ़कर 114 हो गई है। दूसरा महत्वपूर्ण फर्क कीमत का है—इस डील की लागत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये आंकी जा रही है, जिसमें सिर्फ 30 फीसदी स्वदेशी कंटेंट शामिल होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 114 विमानों में से 24 राफेल सीधे फ्रांस से आयेंगे, जबकि बाकी के फाइटर जेट्स को भारत में ही असेंबल किया जाएगा।

सोर्स कोड का मामला क्यों है इतना संवेदनशील?

सोर्स कोड फाइटर जेट का दिमाग होता है। यही तय करता है कि रडार कैसे काम करेगा, कौन सी मिसाइल लगाई जा सकती हैं और सॉफ्टवेयर में किन बदलावों की इजाज़त है।

यदि सोर्स कोड आपके पास नहीं है, तो आप पूरी तरह निर्माता देश पर निर्भर रहते हैं। भविष्य में किसी देसी हथियार या सिस्टम को जोड़ने के लिए भी उनकी अनुमति लेनी पड़ती है।

यही वजह है कि विशेषज्ञ इस डील को लेकर सवाल उठा रहे हैं और इसे महंगी तथा रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

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