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कफ़न में सिमटा 69 साल का इंतजार: इराक के पवित्र ‘कर्बला और नजफ’ जाएगा आयतुल्ला खामेनेई का पार्थिव शरीर, अंतिम विदाई में उमड़ेगा दुनिया भर के शिया समुदाय का सैलाब

ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत के चार महीने बाद, आखिरकार तेहरान में उनके भव्य अंतिम संस्कार की प्रक्रिया इसी हफ्ते शुरू होने जा रही है। ईरान अपने सबसे ताकतवर नेता को विदाई देने के लिए पूरी शान-ओ-शौकत के साथ तैयारियां कर रहा है, जिसमें भारत सहित दुनिया भर के दिग्गज नेता शामिल होने पहुंच रहे हैं।

Contents
1. 69 साल बाद ‘आखिरी सफर’: नजफ और कर्बला में थमेगा खामेनेई का कारवां2. शिया समुदाय के लिए क्यों सर्वोपरि हैं इराक के ये दो शहर?नजफ (बगदाद से 150 किमी): यह वह ऐतिहासिक नगरी है जहां पैगंबर मोहम्मद के दामाद और शिया समुदाय के पहले इमाम, इमाम अली की मजार है। यहां स्थित इमाम अली मस्जिद में भारत सहित दुनिया भर से साल भर करोड़ों जायरीन पहुंचते हैं।कर्बला (बगदाद से 90 किमी): इस्लामिक इतिहास की सबसे बड़ी और दर्दनाक जंग की गवाह रही कर्बला की धरती पर इमाम अली के नवासे इमाम हुसैन की कब्र है। इसी मैदान में यजीद की फौज के खिलाफ लड़ते हुए इमाम हुसैन और उनके सौतेले भाई अब्बास शहीद हुए थे, जिनकी याद में हर साल मुहर्रम मनाया जाता है।3. धार्मिक अकीदा या बड़ा राजनीतिक संदेश?

लेकिन इस पूरी शव यात्रा का सबसे भावुक और ऐतिहासिक पल वह होगा, जब खामेनेई का पार्थिव शरीर पड़ोसी देश इराक ले जाया जाएगा। अपने जीवनकाल में जो नेता पिछले 69 वर्षों से इराक की सरजमीं पर कदम नहीं रख सका, अब कफ़न में लिपटा उसका पार्थिव शरीर वहां के सबसे पवित्र स्थलों का दीदार करेगा।

1. 69 साल बाद ‘आखिरी सफर’: नजफ और कर्बला में थमेगा खामेनेई का कारवां

अंतिम संस्कार समारोह के आधिकारिक प्रवक्ता के अनुसार, 9 जुलाई को ईरान के मशहद में दफनाने से ठीक एक दिन पहले, यानी 8 जुलाई को आयतुल्ला खामेनेई के पार्थिव शरीर को इराक ले जाया जाएगा।

  • 1957 के बाद पहली यात्रा: खामेनेई ने आखिरी बार साल 1957 में इराक के पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा की थी। इसके बाद 1968 में उन्होंने इराक जाने का प्रयास किया, लेकिन राजनीतिक पाबंदियों और देश छोड़ने पर रोक के कारण वह नहीं जा सके।
  • पवित्र इमामों की चौखट पर हाजिरी: 8 जुलाई को उनके शव को शिया समुदाय के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों— इमाम अली (नजफ), इमाम हुसैन (कर्बला) और अब्बास इब्न अली के रौजों (पवित्र स्थलों) पर ले जाया जाएगा।

2. शिया समुदाय के लिए क्यों सर्वोपरि हैं इराक के ये दो शहर?

इराक और ईरान न सिर्फ भौगोलिक सीमाएं साझा करते हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच शिया समुदाय की गहरी धार्मिक आस्था की जड़ें जुड़ी हैं। ईरान में जहां 90 फीसदी से अधिक शिया आबादी है, वहीं इराक में भी इनकी संख्या 50 फीसदी से ज्यादा है।

नजफ (बगदाद से 150 किमी): यह वह ऐतिहासिक नगरी है जहां पैगंबर मोहम्मद के दामाद और शिया समुदाय के पहले इमाम, इमाम अली की मजार है। यहां स्थित इमाम अली मस्जिद में भारत सहित दुनिया भर से साल भर करोड़ों जायरीन पहुंचते हैं।

कर्बला (बगदाद से 90 किमी): इस्लामिक इतिहास की सबसे बड़ी और दर्दनाक जंग की गवाह रही कर्बला की धरती पर इमाम अली के नवासे इमाम हुसैन की कब्र है। इसी मैदान में यजीद की फौज के खिलाफ लड़ते हुए इमाम हुसैन और उनके सौतेले भाई अब्बास शहीद हुए थे, जिनकी याद में हर साल मुहर्रम मनाया जाता है।

3. धार्मिक अकीदा या बड़ा राजनीतिक संदेश?

खामेनेई की मौत को ईरान में ‘शहादत’ का दर्जा दिया जा रहा है। रक्षा और कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पवित्र नजफ और कर्बला की सड़कों से खामेनेई के कफ़न का गुजरना केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने हैं।

लंबे समय से प्रतिबंधों और संघर्षों से जूझ रहे ईरान के लिए यह शव यात्रा मध्य-पूर्व (Middle East) में उसके समर्थक देशों और शिया समुदाय के बीच एकजुटता का एक बहुत बड़ा और अचूक संदेश देगी। यह अभूतपूर्व मंजर इस्लामिक इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होने जा रहा है।

news desk

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