नई दिल्ली: लोकसभा में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। इस बीच तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के बदले रुख ने सत्ता पक्ष की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। हालांकि पार्टी ने अभी समर्थन का ऐलान नहीं किया है, लेकिन अब वह पहले विधेयक का अंतिम प्रारूप देखने की बात कह रही है। ऐसे में लोकसभा में सरकार के लिए दो-तिहाई बहुमत का गणित एक बार फिर चर्चा में है।
लोकसभा में किसी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। इसके लिए 360 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है। मौजूदा स्थिति में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास लगभग 326 सांसदों का समर्थन है। यानी बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए उसे अभी भी 34 अतिरिक्त सांसदों की आवश्यकता है।
सूत्रों के अनुसार, DMK अब पहले की तरह सीधे विरोध की बजाय विधेयक के प्रावधानों का इंतजार कर रही है। चर्चा है कि यदि विधेयक में राज्यों की विधानसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत वृद्धि का प्रावधान शामिल होता है, तो पार्टी समर्थन पर विचार कर सकती है।
पिछले सत्र में जब सरकार यह विधेयक लेकर आई थी, तब DMK ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे तमिलनाडु के हितों के खिलाफ बताया था। उस समय पार्टी के रुख का असर विपक्षी गठबंधन पर भी देखने को मिला था।
लोकसभा में DMK के 22 सांसद हैं। यदि पार्टी सरकार के पक्ष में आती है, तो संविधान संशोधन विधेयक के लिए आवश्यक संख्या जुटाने में सत्ता पक्ष की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हो सकती है। हालांकि, फिलहाल पार्टी ने किसी भी तरह का अंतिम फैसला नहीं लिया है।
DMK के वरिष्ठ नेता तिरुचि शिवा ने भी संकेत दिया है कि पार्टी अब पहले विधेयक का प्रारूप देखेगी और उसके बाद ही समर्थन या विरोध पर निर्णय करेगी।
इस बीच संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की अटकलों पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। उन्होंने कहा कि 16 से 18 अगस्त के बीच महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है।
हालांकि, सरकार मौजूदा मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने की संभावनाओं पर काम कर रही है। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करना है।
राजनीतिक हलकों में अब सबसे अधिक नजर इस बात पर है कि सरकार विधेयक का अंतिम मसौदा कब पेश करती है और उसमें कौन-कौन से प्रावधान शामिल किए जाते हैं। वहीं, DMK समेत अन्य विपक्षी दलों का अंतिम रुख भी इस विधेयक की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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