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जिस पार्टी को कोई नहीं जानता था, उसमें पहुंचे TMC के 20 सांसद; अचानक बदल गया सियासी समीकरण

नई दिल्ली: कुछ दिन पहले तक राष्ट्रीय राजनीति में लगभग अनजान मानी जाने वाली एक छोटी राजनीतिक पार्टी अचानक सुर्खियों के केंद्र में आ गई है। वजह बनी तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों की बड़ी राजनीतिक चाल। दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) का रास्ता चुना है, जिसके बाद इस पार्टी की राजनीतिक हैसियत को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

कौन है NCPI, जो अचानक चर्चा में आ गई?

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का पंजीकरण 20 जनवरी 2023 को चुनाव आयोग के पास एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में हुआ था। पार्टी का पंजीकरण पश्चिम बंगाल में हुआ, लेकिन इसकी शुरुआती चुनावी सक्रियता त्रिपुरा में दिखाई दी।

त्रिपुरा चुनाव में नहीं चला जादू

पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई थी। सात सीटों पर उम्मीदवार उतारे गए, लेकिन चार उम्मीदवारों के नामांकन खारिज हो गए। अंत में पार्टी केवल दो सीटों पर चुनाव लड़ सकी। दोनों सीटों को मिलाकर पार्टी को कुल 822 वोट मिले। एक समर्थित उम्मीदवार को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा, जिसे 376 वोट मिले। कुल मिलाकर पार्टी चुनावी स्तर पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ सकी।

कम संसाधनों से बनी थी पार्टी

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, पार्टी को शुरुआती दौर में बहुत सीमित आर्थिक सहयोग मिला। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा भी छोटा रहा और इसका संचालन पश्चिम बंगाल के हावड़ा क्षेत्र से जुड़ा बताया गया।

चुनाव के बाद लगभग गायब हो गई थी पार्टी

त्रिपुरा चुनाव खत्म होने के बाद पार्टी की गतिविधियां लगभग ठहर गईं। कई स्थानीय नेताओं और उम्मीदवारों ने दावा किया कि चुनाव के बाद संगठन सक्रिय नहीं दिखा और संपर्क धीरे-धीरे कम हो गया। संसाधनों और संगठनात्मक चुनौतियों की भी चर्चा सामने आई।

अब कैसे बदल गया पूरा राजनीतिक समीकरण?

ताजा घटनाक्रम में दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के बागी सांसदों ने इसी पार्टी का सहारा लिया है। यदि यह राजनीतिक पुनर्गठन औपचारिक रूप से आगे बढ़ता है, तो एक ऐसी पार्टी जो अब तक सीमित मौजूदगी रखती थी, वह सीधे राष्ट्रीय राजनीति के बड़े विमर्श का हिस्सा बन सकती है।

लोकसभा में नई तस्वीर बनने की चर्चा

बताया जा रहा है कि बागी सांसदों ने अलग संसदीय पहचान और बैठने की व्यवस्था को लेकर भी पहल की है। इसी वजह से अब यह मामला सिर्फ पार्टी बदलने का नहीं, बल्कि संसद के भीतर नए राजनीतिक समीकरण बनने की बहस तक पहुंच गया है।

vineet verma

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