नई दिल्ली। देश की युवा पीढ़ी नशे की जिस दलदल में धंस रही है, उसकी हकीकत सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा डरावनी हो सकती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हालिया आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आमतौर पर जब भी नशे की बात आती है, तो जेहन में ‘पंजाब’ का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन NCRB की रिपोर्ट एक अलग ही कहानी बयां कर रही है। आंकड़ों की रेस में केरल नंबर वन पर है, जबकि पंजाब इस सूची में तीसरे स्थान पर खिसक गया है।
NCRB के साल 2022 के आंकड़ों के अनुसार, NDPS एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों में केरल ने सबको पीछे छोड़ दिया है…
| राज्य | दर्ज मामले (2022) | कुल मामलों में हिस्सेदारी |
| केरल | 26,619 | ~23% |
| महाराष्ट्र | 13,830 | ~12% |
| पंजाब | 12,442 | ~11% |
| उत्तर प्रदेश | 11,541 | ~10% |
| तमिलनाडु | 10,385 | ~09% |
हैरानी की बात: सिर्फ इन 5 राज्यों में ही देश के करीब 65% नशे के मामले दर्ज हैं. गुजरात, जिसका नाम अक्सर बंदरगाहों पर बड़ी बरामदगी के लिए आता है, इस सूची में काफी नीचे है। राज्यसभा में गृह मंत्रालय ने एनसीआरबी के हवाले से जो राज्यवार आंकड़े दिए, उनके अनुसार साल 2022 में पंजाब में एनडीपीएस एक्ट 12,442 केस दर्ज हुए।
साल 2021 में देश भर में NDPS के 78,331 मामले थे, जो 2022 में बढ़कर 1.15 लाख के पार हो गए। यह करीब 47% की बढ़ोतरी है। यह उछाल दो तरफा संकेत देता है-या तो पुलिस की सक्रियता बढ़ी है या फिर नशे की मांग और सप्लाई दोनों ने समाज में गहरी पैठ बना ली है।
आंकड़ों का सबसे डरावना पहलू यह है कि पुलिस अब केवल सप्लायर को ही नहीं पकड़ रही, बल्कि ‘उपभोक्ता’ यानी नशा करने वालों की संख्या में भी भारी वृद्धि देखी गई है।
यह साफ है कि समस्या सिर्फ सीमा पार से आने वाली ड्रग्स की नहीं है, बल्कि हमारे समाज के भीतर बढ़ती ‘डिमांड’ की भी है।
साल 2022 में एनडीपीएस से जुड़े मामलों में कुल 1,44,812 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 2021 में यह आंकड़ा 1,07,808 था। यानी एक ही साल में गिरफ्तारियों में करीब 34 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
जब्ती के आंकड़ों पर नजर डालें तो गांजा सबसे आगे रहा। 2022 में लगभग 17,11,916 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया, जबकि कुल नशीले पदार्थों की जब्ती 17,16,700 किलोग्राम रही। इससे साफ होता है कि मात्रा के लिहाज से गांजा अब भी ड्रग्स तस्करी का सबसे बड़ा हिस्सा बना हुआ है।
NCRB ने खुद अपनी रिपोर्ट में आगाह किया है कि इन आंकड़ों को अंतिम सच न माना जाए. इसके पीछे तीन बड़े कारण हो सकते हैं..
क्या पंजाब की ‘बदनामी’ केवल एक धारणा है या फिर अन्य राज्यों में नशा इतनी खामोशी से फैल रहा है कि वह पुलिस की फाइलों तक नहीं पहुंच पा रहा? 2024 के विस्तृत आंकड़ों का इंतजार है, लेकिन वर्तमान तस्वीर देश के भविष्य (युवाओं) के लिए खतरे की घंटी है।
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