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रेलकर्मियों की त्वचा की परेशानी देख डॉक्टर ने रसोई में बनाया ‘हरा साबुन’, 5 हजार से 50 हजार रोजाना तक पहुंचा उत्पादन; ऐसे खड़ा हुआ 600 करोड़ का मेडिमिक्स साम्राज्य

चेन्नई: साल 1960 में चेन्नई के किलपॉक मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. वीपी सिधन ने रेलवे में प्रशिक्षु एलोपैथिक डॉक्टर के तौर पर नौकरी शुरू की। वह आधुनिक चिकित्सा पद्धति के डॉक्टर थे, लेकिन उनका परिवार पीढ़ियों से आयुर्वेद से जुड़ा था। रेलवे में काम के दौरान उन्होंने देखा कि धूल, पसीने और कोयले के बीच काम करने वाले कर्मचारियों को त्वचा संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

रेलकर्मियों की इस समस्या को देखकर उन्होंने अपने पारिवारिक आयुर्वेदिक नुस्खों के आधार पर एक तेल तैयार किया। इस तेल का इस्तेमाल करने वाले लोगों को फायदा मिला और धीरे-धीरे डॉक्टर के बनाए इस नुस्खे की चर्चा होने लगी। लेकिन जल्द ही एक नई परेशानी सामने आ गई।

तेल असरदार था, लेकिन चिपचिपाहट बनी परेशानी

डॉ. सिधन का तैयार किया हुआ तेल लोगों के लिए उपयोगी साबित हो रहा था, लेकिन उसकी चिपचिपाहट के कारण कई लोग इसे लगाने से हिचकने लगे। इसी दौरान उनके दोस्तों ने सुझाव दिया कि क्यों न इसी मिश्रण को साबुन के रूप में तैयार किया जाए।

डॉ. सिधन को यह विचार पसंद आया। इससे लोगों को तेल की चिपचिपाहट से भी राहत मिल सकती थी और आयुर्वेदिक सामग्री का इस्तेमाल भी जारी रखा जा सकता था। इसके बाद उन्होंने साबुन तैयार करने पर काम शुरू किया।

साल 1969 में उनके घर की रसोई से मेडिमिक्स की शुरुआत हुई। ‘मेडि’ को मेडिसिन और ‘मिक्स’ को जड़ी-बूटियों तथा प्राकृतिक तेलों के मिश्रण से जोड़ा गया।

पति-पत्नी ने खुद हाथ से तैयार किया साबुन

मेडिमिक्स के शुरुआती दिनों में डॉ. सिधन और उनकी पत्नी खुद हाथों से साबुन तैयार करते थे। इसे मरीजों को डॉक्टर की सलाह के तौर पर दिया जाता था। धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ने लगी तो चेन्नई के पेरांबुर में एक छोटे से कमरे में एक कर्मचारी के साथ इसकी शुरुआती फैक्ट्री शुरू की गई।

उस समय कंपनी के पास विज्ञापन पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं था। लेकिन इस्तेमाल करने वाले लोगों के अनुभव और भरोसे ने इसका प्रचार कर दिया। धीरे-धीरे मेडिमिक्स चेन्नई के मेडिकल स्टोरों पर अपनी जगह बनाने लगा।

1980 की हड़ताल ने बंद कर दी फैक्ट्री

कंपनी के सफर में 1980 में बड़ा झटका लगा। मजदूरों की हड़ताल के चलते फैक्ट्री बंद हो गई और करीब तीन साल तक उत्पादन ठप रहा।

हालांकि डॉ. सिधन ने इस मुश्किल दौर में भी कारोबार छोड़ने का फैसला नहीं किया। 1983 में उन्होंने दोबारा काम शुरू किया। मजदूरों का भरोसा जीता और उत्पादन व्यवस्था में बदलाव किए गए।

इसके बाद साबुन का उत्पादन रोजाना 5 हजार से बढ़कर 50 हजार तक पहुंच गया। कंपनी ने अपने प्रचार में इसे डॉक्टरों की सलाह वाला साबुन बताया और धीरे-धीरे उपभोक्ताओं के बीच इसकी पहचान मजबूत होती चली गई।

छोटी रसोई से 600 करोड़ रुपये की कंपनी तक

मेडिमिक्स की शुरुआत एक छोटे घरेलू प्रयोग से हुई थी, लेकिन समय के साथ यह एक बड़े आयुर्वेदिक साबुन ब्रांड में बदल गया। आज यह 30 से ज्यादा देशों में पहुंच चुका है।

मेडिमिक्स को दुनिया का सबसे बड़ा हस्तनिर्मित आयुर्वेदिक साबुन बताया जाता है। कंपनी का मूल्यांकन करीब 600 करोड़ रुपये है। जिस उत्पाद की शुरुआत रेलकर्मियों की त्वचा संबंधी परेशानी दूर करने की कोशिश से हुई थी, उसने आगे चलकर एक बड़े कारोबारी साम्राज्य का रूप ले लिया।

vineet verma

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