सियासी

एफआईआर दर्ज होगी या चलेगा महाभियोग? पूर्व जज यशवंत वर्मा के केस में लीगल एक्सपर्ट्स की बंटी राय

इलाहाबाद और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद में जांच समिति की रिपोर्ट पेश होने के बाद अब कानूनी हलकों में बहस छिड़ गई है कि आगे क्या होगा? जांच समिति द्वारा सरकारी आवास से अघोषित नकदी मिलने समेत तीनों गंभीर आरोपों को सिद्ध पाए जाने के बाद अब कानूनी विशेषज्ञों (Legal Experts) की राय बंटी हुई है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जज पद से इस्तीफा देने के बाद उन पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जानी चाहिए, वहीं कुछ का तर्क है कि महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया भी जारी रखी जा सकती है।

  • जांच रिपोर्ट में दोषी सिद्ध: लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी गई तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के आवास से मिली बड़ी नकदी और साक्ष्यों की अनदेखी के आरोपों को सही पाया गया है।
  • इस्तीफे के बाद दो राय: पूर्व जज द्वारा पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद संवैधानिक विशेषज्ञों में कानूनी कार्रवाई को लेकर अलग-अलग राय है।
  • FIR दर्ज करने की मांग: सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि इस्तीफा देने के बाद उन्हें प्राप्त न्यायिक संरक्षण (Judicial Immunity) समाप्त हो चुका है, इसलिए सीधे क्रिमिनल एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।
  • महाभियोग पर सस्पेंस: कुछ संविधान विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं हुआ है, तो संसद में महाभियोग प्रक्रिया के जरिए उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए ताकि वे पेंशन लाभ न ले सकें।

लीगल एक्सपर्ट्स की राय: FIR दर्ज होगी या चलेगा महाभियोग?

  1. राकेश द्विवेदी (वरिष्ठ वकील व संविधान विशेषज्ञ):“अब रिपोर्ट संसद में पेश हो चुकी है और उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। उन्हें अब पद से नहीं हटाया जा सकता, इसलिए महाभियोग प्रस्ताव निष्प्रभावी हो चुका है। हालांकि, रिपोर्ट के आधार पर पुलिस में एफआईआर निश्चित रूप से दर्ज की जा सकती है।”
  2. विकास सिंह (अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन):“जब तक इस्तीफा स्वीकार नहीं होता, तब तक महाभियोग चलाया जा सकता है। महाभियोग से हटाए जाने पर पेंशन संबंधी लाभ खत्म हो जाते हैं। अगर रिपोर्ट में सिफारिश है, तो एफआईआर भी जरूर दर्ज होगी।”
  3. डॉ. राजीव धवन (वरिष्ठ वकील):“इस्तीफे के साथ ही संसद का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया है। जब वह जज थे तब एफआईआर के लिए सीजेआई (CJI) की अनुमति जरूरी थी, लेकिन अब वह संरक्षण खत्म हो चुका है। निष्पक्ष जांच सिर्फ आपराधिक कार्रवाई (Criminal Proceedings) से ही संभव है।”
  4. अनिल तिवारी (पूर्व अध्यक्ष, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन):“न्यायिक संरक्षण का मतलब यह नहीं कि कोई घर में भारी नकदी रखे। इस्तीफा देने के बाद अब कानून मंत्रालय को पहल कर एफआईआर दर्ज करवानी चाहिए।”

क्या है पूरा मामला?

जस्टिस यशवंत वर्मा के नई दिल्ली स्थित 30, तुगलक क्रेसेंट स्थित आधिकारिक बंगले के स्टोररूम से 500 रुपये के नोटों के रूप में अघोषित नकदी बरामद हुई थी। जांच समिति ने पाया कि वह इस राशि के स्रोत और स्वामित्व को लेकर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके, जिसके बाद उनके खिलाफ यह रिपोर्ट तैयार की गई

news desk

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