वैसे तो चुनावी मौसम में नई पार्टियों का आना एक रस्म जैसा है. जैसे इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान बिहार में देखने को मिल रहा है. इस बार प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की बड़ी चर्चा है. अलग अलग सियासी पंडित उनके बारे में अपना अपना आंकलन कर रहे हैं. लेकिन इस शोर शराबे के बीच एक ऐसी पार्टी उभरी है, जिसने अपनी उपस्थिति और रणनीति से हर किसी को हैरान कर दिया है.
हम बात कर रहे हैं भारतीय इनक्लूसिव पार्टी यानी IIP की, जिसका उभार सिर्फ एक नए दल की एंट्री नहीं, बल्कि यह संकेत है कि बिहार की राजनीति अब सत्ता केंद्र-आधारित नियंत्रण से हटकर साझा नेतृत्व की ओर बढ़ रही है. महागठबंधन का हिस्सा बनी IIP को सीट बंटवारे में तीन सीटें मिली हैं. चर्चा है कि कांग्रेस ने IIP को अपने कोटे से 2 सीटें दी है. जिससे सवाल उठने लगा है कि क्या INDIA गठबंधन अब पुराने चेहरों और जातिगत बुनावट से आगे बढ़कर नए सामाजिक समूहों को भागीदारी देने को तैयार है?
IIP क्यों बन गई INDIA ब्लॉक की ज़रूरत?
IIP के नेता आईपी गुप्ता, भले ही राजनीति में नया चेहरा हों, लेकिन उन्होंने जिस तरह से तंती, पान और अन्य उपेक्षित समुदायों को अपने मंच से जोड़ा है, वह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे समाज के उस वर्ग को आवाज़ दे रहे हैं जो अब तक सिर्फ वोटबैंक समझा गया. देखने मेंइन जातियों की संख्या भले ही कम लगे. लेकिन क्लोज मार्जिन वाली सीटों पर इनका समर्थन नतीजों को बदलने वाले साबित हो सकते हैं.
गठबंधन का नया समीकरण?
IIP जैसे दलों को महागठबंधन में शामिल करना सिर्फ वोट के गणित की बात नहीं. यह एक राजनीतिक संदेश है कि अब छोटी छोटी जातियां अपने लिए सत्ता से बॉर्गेनिंग पॉवर हासिल करने लगी है. IIP के नेता आईपी गुप्ता सहरसा से महागठबंधन के उम्मीदवार होंगे. उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह करनी है. जो समाज में निचले या मजदूर तबके का प्रतिनिधित्व करती है.