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नॉर्वे की धरती पर हुआ एक हाई-वोल्टेज ड्रामा इस समय भारत की घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच देशों के आधिकारिक दौरे के दौरान ओस्लो में जो कुछ हुआ, उसने ‘प्रेस की आजादी’ बनाम ‘कूटनीतिक मर्यादा’ की एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
इस पूरे विवाद को तीन मुख्य कड़ियों और उसके बाद भारत में मचे सियासी घमासान के जरिए समझा जा सकता है।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब पीएम नरेंद्र मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास स्टोर की मुलाकात के बाद, नॉर्वे की एक जानी-मानी पत्रकार हेला लेंग ने पीएम मोदी से सीधे और तल्ख सवाल दाग दिए।
जब पीएम मोदी वहां से आगे बढ़ रहे थे, तब हेला लेंग ने कैमरे के सामने चिल्लाकर पूछा:
“प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?”
पीएम मोदी बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए। इसके बाद हेला लेंग ने सोशल मीडिया पर वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का हवाला देते हुए लिखा कि नॉर्वे पहले और भारत 157वें स्थान पर है, इसलिए उन्हें जवाब की उम्मीद भी नहीं थी।
हेला के इस पोस्ट के बाद नॉर्वे में भारतीय दूतावास ने उन्हें सीधे भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आने और सवाल पूछने का खुला न्योता दिया। हेला वहां पहुंचीं और उनका सवाल बेहद आक्रामक था:
हेला लेंग: “हम आप पर भरोसा क्यों करें? क्या आप वादा करते हैं कि अपने देश में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन को रोकेंगे? आपके प्रधानमंत्री मुश्किल सवालों का जवाब देना कब शुरू करेंगे? मुझे इसका जवाब फौरन चाहिए।”
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सीबी जॉर्ज और प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस तीखे सवाल का जवाब भारतीय कूटनीति के पारंपरिक अंदाज में दिया।
सीबी जॉर्ज ने आगे जी20 में अफ्रीकी संघ को शामिल कराने और वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता का जिक्र किया, लेकिन जवाब पूरा होने से पहले ही पत्रकार हेला लेंग प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर बाहर चली गईं।
ओस्लो की इस घटना की गूंज फौरन भारत के राजनीतिक गलियारों में सुनाई दी। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे पर सरकार को बुरी तरह घेरा है।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर हो रही ट्रोलिंग और दावों के बीच पत्रकार हेला लेंग ने एक्स (ट्विटर) पर एक और पोस्ट साझा कर अपनी स्थिति साफ की। उन्होंने लिखा:
“पत्रकारिता कभी-कभी टकरावपूर्ण होती है। सत्ता में मौजूद व्यक्ति से सीधा जवाब मांगना मेरा काम है, मुझे सिर्फ तैयार किए हुए जुमले नहीं चाहिए। और हां, मैं कोई विदेशी जासूस नहीं हूं, जिसे किसी सरकार ने भेजा हो। मेरा काम सिर्फ पत्रकारिता है।”
यह घटना दर्शाती है कि वैश्विक मंचों पर भारतीय कूटनीति अब रक्षात्मक होने के बजाय अपने ‘सॉफ्ट पावर’ (योग, वैक्सीन, प्राचीन इतिहास) और वैश्विक नेतृत्व के दावों को आगे रखकर आक्रामक रुख अपना रही है। वहीं, घरेलू विपक्ष इसे प्रधानमंत्री की ‘प्रेस से दूरी’ की छवि को मजबूत करने के मौके के रूप में देख रहा है।
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