व्यापार का संसार लेन-देन पर ही टिका है, कभी देना पड़ता है, कभी लेना.
भक्त ने पूछा "महाराज जी, व्यवसाय ठीक चलता है, पर उधार-लेनदेन की चिंता रहती है ,अगर जीवन के अंत तक कोई ऋण बचा, तो भगवत् प्राप्ति कैसे होगी?"
महाराज ने कहा "व्यापार में लेन-देन कागजों में लिखा जाता है, तुम्हारे बाद तुम्हारी संतानें ही यह ऋण चुकाएंगी,शास्त्रों में कहा गया है"
"संतान का सबसे बड़ा धर्म यह है कि वह माता-पिता के अधूरे कार्य पूरे करे, चाहे ऋण हो या पुण्य का कार्य, यह उनके लिए धर्म और सेवा दोनों है"
महाराज जी ने कहा "आज उधार लिया, कल चुका दिया,इसे लेकर भय मत करो. राधा रानी की कृपा में जो श्रद्धा रखेगा, उसका कोई कार्य अधूरा नहीं रहेगा"
"भगवत् प्राप्ति केवल एक कर्म से नहीं, बल्कि हर कर्म भक्ति भाव से करने से होती है, ईमानदारी बच्चों को सत्य और धर्म का मार्ग सिखाती है"