अपर असम में कांग्रेस की हार और आगे का रोडमैप
अगर आप असम की राजनीति को समझना चाहते हैं, तो अपर असम की कहानी जरूर पढ़िए। टिनसुकिया, डिब्रूगढ़, शिवसागर, जोरहाट जैसे इलाके सिर्फ जगहों के नाम नहीं हैं, ये असम की धड़कन हैं। यहां का अहोम समुदाय, चाय बागानों में पसीना बहाने वाले मजदूर, मोरान-मटक जैसे छोटे लेकिन अहम समुदाय- सबकी अपनी-अपनी कहानी है। करीब 28-30 विधानसभा सीटों वाला यह इलाका कभी कांग्रेस की जागीर हुआ करता था। लेकिन 2016 के बाद? कहानी पूरी तरह पलट गई।
2011 तक यहां कांग्रेस का राज था। तरुण गोगोई का नाम लोग इज्जत से लेते थे। विकास की बातें, बाढ़ से निपटने के वादे, और जातीय संतुलन बनाए रखने की कला—कांग्रेस हर मोर्चे पर मजबूत दिखती थी। अहोम समुदाय हो या चाय बागान के मजदूर, सब कांग्रेस के साथ खड़े थे।
पर जैसा कि अक्सर होता है, 15 साल की सत्ता धीरे-धीरे बोझ बन गई। लोगों को लगने लगा कि अब बदलाव चाहिए। यही वो नींव थी जिस पर आगे चलकर कांग्रेस की इमारत ढहने वाली थी।
2016 का चुनाव असल मायने में एक मोड़ था। भाजपा और अगप का गठबंधन कांग्रेस पर भारी पड़ा। यह सिर्फ सत्ता बदलना नहीं था, बल्कि सोच और भावनाओं का बदलना था।
भ्रष्टाचार की बातें तेज हो गई थीं। नौजवानों को नौकरी नहीं मिल रही थी, हर साल बाढ़ आती थी और हालात वैसे के वैसे रहते थे। स्वास्थ्य और शिक्षा की हालत बदतर थी। ऐसे में 2014 की मोदी लहर ने पूरे माहौल को बदल दिया। और फिर 2015 में जब हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया, तो समझ लीजिए—खेल खत्म हो चुका था।
भाजपा ने एक शातिर रणनीति अपनाई। उन्होंने “घुसपैठ” के मुद्दे को असमिया अस्मिता से जोड़ दिया। कांग्रेस को “घुसपैठियों का रक्षक” बताकर लोगों की भावनाएं भड़का दीं। नतीजा? जहां 2011 में कांग्रेस का लगभग एकछत्र राज था, वहीं 2016 में वो चंद सीटों पर सिमट गई।
अगर 2016 झटका था, तो 2021 तबाही थी। कांग्रेस ने एक बड़ी गलती की एआईयूडीएफ के साथ हाथ मिलाया। जी हां, वही बदरुद्दीन अजमल वाली पार्टी। इसे महाजोत का नाम दिया गया, लेकिन भाजपा ने इसे “मुगल गठबंधन” कहकर हिंदू वोटरों को फोड़ लिया।
अपर असम में कांग्रेस पर “मुस्लिम पार्टी” का ठप्पा लग गया। हालांकि एआईयूडीएफ का असली आधार तो लोअर असम में है, लेकिन इससे कांग्रेस की छवि खराब हो गई।
दूसरी तरफ, भाजपा चुप नहीं बैठी। उन्होंने ओरुनोदोई योजना लाई, चाय मजदूरों की मजदूरी बढ़वाई, स्वास्थ्य योजनाएं दीं। धीरे-धीरे वो समुदाय जो दशकों से कांग्रेस के पक्के समर्थक थे, भाजपा के साथ नजर आने लगे।
क्या हुआ अंत में? 28 में से 23 सीटें एनडीए के पास और कांग्रेस सिर्फ चार सीटों पर। सोचिए, कभी जो अपना किला था, वहां खुद ही बेघर हो गए।
अपर असम में एक बड़ा बदलाव यह आया कि “असमिया” होने का मतलब बदल गया। पहले यह सिर्फ भाषा और संस्कृति की बात थी, अब इसमें धर्म का रंग भी घुल गया। भाजपा ने असमिया राष्ट्रवाद को हिंदुत्व से जोड़ दिया और यह फॉर्मूला काम कर गया।
कांग्रेस क्या कर रही थी? वो “सॉफ्ट हिंदुत्व” और अल्पसंख्यकों को साथ रखने के बीच झूल रही थी। न इधर के रहे, न उधर के।
आर्थिक मोर्चे पर भी भाजपा आगे निकल गई। चाय बागानों के इलाकों में उनकी सीधी लाभ वाली योजनाओं ने कांग्रेस की पुरानी नीतियों को पीछे छोड़ दिया।
और सबसे बड़ी दिक्कत? नेतृत्व की कमी। तरुण गोगोई के बाद पार्टी में कोई ऐसा चेहरा नहीं था जो पूरे अपर असम को अपने साथ ले जा सके। गुटबाजी बढ़ती गई, नेता पलायन करते गए, और युवा चेहरे गायब रहे।
2021 के बाद कांग्रेस ने थोड़ी समझदारी दिखाई और एआईयूडीएफ से दूरी बना ली। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुछ जगहों पर बेहतर प्रदर्शन से उम्मीद की किरण जरूर नजर आई। लेकिन पंचायत चुनावों ने साफ कर दिया कि राह आसान नहीं है।
2026 अगर कांग्रेस को वाकई वापसी करनी है, तो उन्हें कुछ बुनियादी काम करने होंगे:
पहला, बाढ़, बेरोजगारी और चाय मजदूरों जैसे असली स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देना होगा। लोग अब सिर्फ नारों से नहीं, काम से प्रभावित होते हैं।
दूसरा, संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना होगा। दिल्ली से चलाई गई पार्टी यहां काम नहीं करेगी।
तीसरा, जातीय समीकरण को संभालना होगा, लेकिन ध्रुवीकरण की राजनीति में न फंसते हुए। यह कला है, और इसे समझना जरूरी है।
अपर असम में कांग्रेस का पतन कोई अचानक हुआ हादसा नहीं था। यह रणनीतिक गलतियों, नेतृत्व की कमी और बदलते सामाजिक-राजनीतिक माहौल को न समझ पाने का नतीजा था। भाजपा ने हर कमजोरी को पहचाना और उसका फायदा उठाया- असमिया पहचान का सवाल हो, कल्याण योजनाएं हों या मजबूत गठबंधन।
2026 में अगर कांग्रेस को वापसी करनी है, तो उसे बाढ़, रोजगार और चाय मजदूरों जैसे स्थानीय मुद्दों पर फोकस करना होगा, संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना होगा और जातीय संतुलन साधते हुए ध्रुवीकरण की राजनीति से बचना होगा।
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