लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अगले साल 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। खासकर कांशीराम की जयंती को लेकर सपा और BSP दोनों दल खुलकर सक्रिय दिख रहे हैं। दोनों ही पार्टियां अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए कांशीराम के योगदान और छवि का उपयोग कर रही हैं।
इसी बीच, राहुल गांधी इस मामले में भी सक्रिय नजर आ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, वे कांशीराम को लेकर आयोजित किसी आयोजन में शामिल होंगे और इस दौरान दलित स्कॉलर्स से बातचीत कर राज्य में पार्टी की अलग पहचान बनाने का प्रयास करेंगे। कांग्रेस इस साल कांशीराम जयंती को “सामाजिक परिवर्तन दिवस” के रूप में मनाएगी।
समाजवादी पार्टी (सपा) ने घोषणा की है कि वे इस वर्ष कांशीराम की 92वीं जयंती को “बहुजन समाज दिवस (PDA दिवस)” के रूप में मनाएंगे। पार्टी के अनुसार, अखिलेश यादव के निर्देशानुसार यह कार्यक्रम 15 मार्च 2026, रविवार को प्रत्येक जिला मुख्यालय में आयोजित होगा।
सपा का यह कदम 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित समुदाय से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए रणनीतिक माना जा रहा है। पार्टी इस अवसर का उपयोग दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए कर सकती है।
हालांकि, BSP के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने सपा के इस फैसले पर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह अखिलेश यादव का “नाटक” है। उन्होंने याद दिलाया कि जब सपा अध्यक्ष मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कांशीराम की जयंती पर छुट्टी को निरस्त किया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही सपा और कांग्रेस कांशीराम जयंती के दिन मंच साझा न करें, लेकिन असली निशाना BSP और BJP के वोट बैंक हैं। माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस India Alliance के परचम तले चुनाव लड़ेंगी और सीटों का बंटवारा करेंगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि दलित और पिछड़े वर्ग के मतों को एकजुट करने के लिए दोनों दल पहले से ही सक्रिय हो गए हैं। इस रणनीति के तहत, आगामी चुनाव में दोनों पार्टियों के लिए वोट बैंक का संगठित खेल निर्णायक साबित हो सकता है।