PHOTO: Instagram @aslimonalisa
टेलीविजन और बॉलीवुड की दुनिया में कई ऐसे कलाकार रहे हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत छोटे बजट की फिल्मों से की। कुछ कलाकारों के लिए ये फिल्में काम पाने का जरिया बनीं, तो कुछ ने आर्थिक जरूरतों के चलते ऐसे प्रोजेक्ट्स में काम किया।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कम बजट में बनने वाली बी-ग्रेड फिल्में आखिर शूट कैसे होती हैं? इनकी शूटिंग का तरीका बड़े बजट की फिल्मों से काफी अलग होता है। यहां कहानी से लेकर लोकेशन और कलाकारों के चयन तक, हर फैसला बजट और समय को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
बड़े बजट की फिल्मों में आमतौर पर कहानी और स्क्रिप्ट के आधार पर लोकेशन चुनी जाती है। इसके उलट कम बजट की कई फिल्मों में पहले सस्ती और आसानी से उपलब्ध लोकेशन तलाश की जाती है। इसके बाद उसी जगह के हिसाब से कहानी और सीन तैयार किए जाते हैं।
होटल, गेस्टहाउस, फार्महाउस, पुराने मकान और सीमित इंडोर लोकेशन इन फिल्मों की शूटिंग के लिए इस्तेमाल होती हैं। कई बार एक ही जगह को अलग-अलग एंगल से शूट करके फिल्म में कई स्थानों के रूप में दिखाया जाता है। इससे सेट बनाने और लोकेशन बदलने का खर्च बच जाता है।
बी-ग्रेड फिल्मों में आमतौर पर बड़े सितारे नजर नहीं आते। इनमें नए कलाकारों, मॉडल्स, संघर्षरत अभिनेताओं और कभी-कभी टेलीविजन से जुड़े चेहरों को मौका दिया जाता है। कम बजट के कारण निर्माण टीम भी छोटी रखी जाती है।
कई बार निर्देशक ही फिल्म के दूसरे रचनात्मक कामों में भी हाथ बंटाता है। कैमरा, लाइटिंग और प्रोडक्शन से जुड़े सीमित लोग मिलकर शूटिंग पूरी करते हैं। डिजिटल कैमरों के इस्तेमाल ने इस प्रक्रिया को पहले के मुकाबले सस्ता और आसान बनाया है।
कम बजट की फिल्मों में समय सबसे बड़ा संसाधन होता है। इसलिए इनका शूटिंग शेड्यूल बेहद छोटा रखा जाता है। कुछ फिल्में चार से पांच दिन में शूट कर ली जाती हैं, जबकि कुछ प्रोजेक्ट्स में स्क्रिप्ट, शूटिंग, एडिटिंग और मिक्सिंग समेत पूरी प्रक्रिया करीब 15 दिन में निपटाने की कोशिश होती है।
कई प्रोडक्शन में लंबे शूटिंग शिफ्ट भी देखने को मिलते हैं। इसकी वजह यह है कि शूटिंग जितनी जल्दी पूरी होगी, फिल्म उतनी जल्दी रिलीज के लिए तैयार हो सकेगी। हालांकि, हर कम बजट की फिल्म का शेड्यूल एक जैसा नहीं होता।
बी-ग्रेड फिल्मों की मार्केटिंग में पोस्टर और ट्रेलर की अहम भूमिका होती है। कई फिल्मों में बोल्ड कंटेंट, हॉरर और एक्शन को प्रमुखता से दिखाया जाता है। इनके टाइटल और पोस्टर भी इस तरह तैयार किए जाते हैं, जिससे दर्शकों का ध्यान आकर्षित हो।
इंटिमेट सीन की शूटिंग के दौरान कलाकारों की सहमति, निजता और सुरक्षा का ध्यान रखा जाना जरूरी है। ऐसे दृश्यों को केवल जरूरी और अधिकृत क्रू की मौजूदगी में फिल्माया जाना चाहिए।
पहले छोटे बजट की ऐसी फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग छोटे शहरों के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में मिलता था। लेकिन समय के साथ सिनेमाघरों का स्वरूप बदला और डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार हुआ। अब ऐसी कई फिल्में यूट्यूब और दूसरे ऑनलाइन माध्यमों के जरिए दर्शकों तक पहुंचती हैं।
कम लागत, सीमित संसाधन और तेजी से निर्माण इस तरह के सिनेमा की प्रमुख विशेषताएं हैं। यही वजह है कि बड़े बजट की फिल्मों से अलग, इनका पूरा बिजनेस मॉडल कम खर्च में फिल्म तैयार करने और जल्द से जल्द दर्शकों तक पहुंचाने पर टिका होता है।
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