लखनऊ. भारतीय राजनीति में जहां एक ओर बीजेपी और कांग्रेस के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिलता है, वहीं दूसरी तरफ कई ऐसे राजनीतिक घराने हैं जो इन दिनों गंभीर अंदरूनी टूट-फूट का सामना कर रहे हैं. दरअसल, भारतीय राजनीति में परिवारवाद हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है.
सत्ता पक्ष बीजेपी अक्सर यह आरोप लगाती रही है कि फलां-फलां दलों में परिवारवाद हावी है और वहां केवल कुछ खास परिवारों का ही विकास होता है, जबकि बाकी नेताओं की कोई हैसियत नहीं रहती.
किन मौजूदा दौर में तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है. जिन दलों पर परिवारवाद का हमेशा आरोप लगाया जाता था, आज वही राजनीतिक घराने अपने ही कुनबे में दरार, खींचतान और आंतरिक कलह से उबर नहीं पा रहे हैं. कई दिग्गज राजनीतिक परिवार खुद ‘परिवारवाद के फोबिया’ में उलझे हुए हैं और अपनी पार्टी में तालमेल बनाए रखने में नाकाम साबित हो रहे है.
इसका ताज़ा और सबसे बड़ा उदाहरण है लालू प्रसाद यादव का परिवार. लालू यादव की पार्टी राजद इस समय अपने सबसे खराब दौर से गुजरती दिखाई दे रही है. ‘लालू के लालटेन’ की लौ अब धीमी पड़ती नजर आ रही है, और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह परिवार के भीतर बढ़ता टकराव बताया जा रहा है.
बाला साहेब ठाकरे के परिवार में भी पड़ी गहरी दरार
महाराष्ट्र की राजनीति में बाला साहेब ठाकरे और शिवसेना का अपना अलग ही प्रभाव रहा है लेकिन ठाकरे परिवार भी आंतरिक टूट से अछूता नहीं रहा. बाला साहेब के बेटे उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की कमान संभाली, जबकि उनके भतीजे राज ठाकरे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी से अलग हो गए और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया. इतना ही नहीं, बाद में एकनाथ शिंदे की बगावत ने शिवसेना को दो फाड़ कर दिया और पार्टी एक बड़े राजनीतिक संकट में फंस गई.
रामविलास पासवान का परिवार भी टूटा, पार्टी भी बिखरी
लालू प्रसाद यादव से अलग होने के बाद रामविलास पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी बनाकर केंद्र की राजनीति में मजबूत पहचान बनाई.लेकिन उनके निधन के बाद परिवार और पार्टी दोनों में गहरी फूट सामने आई. चाचा पशुपति पारस और भतीजे चिराग पासवान के बीच पार्टी पर कब्जे को लेकर जोरदार संघर्ष हुआ, जो लंबे समय तक पर्दे के पीछे चलता रहा.अंतत: दोनों अलग हो गए और अपनी-अपनी पार्टियों का गठन किया. चुनाव आयोग ने पशुपति पारस के धड़े को “राष्ट्रीय लोक जनता दल” नाम और ‘सिलाई मशीन’ चुनाव चिन्ह आवंटित कर विवाद को समाप्त किया.
महाराष्ट्र की सियासत में शरद पवार बड़ा नाम, लेकिन परिवार में पड़ी दरार
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार हमेशा से एक बड़ा और प्रभावशाली नाम रहे हैं. लेकिन उनकी सत्ता पर पकड़ तब कमजोर होती दिखी जब उनकी ही पार्टी में दरार पड़ गई.
कांग्रेस से अलग होने के बाद शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना की थी. लंबे समय तक यह पार्टी महाराष्ट्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती रही.
लेकिन समय के साथ पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान बढ़ी और शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते उनसे अलग राह पकड़ ली> चाचा और भतीजे की इस लड़ाई ने NCP को दो खेमों में बांट दिया-एक तरफ शरद पवार गुट, और दूसरी तरफ अजित पवार गुट.
आखिरकार अजित पवार ने अपना गुट लेकर एनडीए में शामिल होने का फैसला किया और सत्ता में अपनी भूमिका सुरक्षित कर ली.
वहीं यूपी में 2017 के चुनावों के दौरान सपा में विवाद देखने को मिली, जिसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ा।
इस पूरी कहानी का निष्कर्ष यही है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा के आगे कई नेता परिवार और पार्टी की परंपराओं से हटकर बगावत की राह चुन लेते हैं, ताकि सत्ता में उनकी पकड़ मजबूत बनी रहे