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पूर्वांचल पर बादलों की बेरुखी, पश्चिमी यूपी पर मेहरबानी! देवरिया रह गया था पिछले साल प्यासा…आखिर क्या है बारिश के असमान बंटवारे का कारण?

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मानसून को लेकर हर साल नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के पूर्वी जिलों में बारिश लगातार कमजोर पड़ रही है, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की जा रही है। सबसे चिंताजनक स्थिति देवरिया जिले की रही, जहां पिछले वर्ष देश में सबसे कम बारिश रिकॉर्ड की गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर पूर्वांचल में बादल क्यों मेहरबान नहीं हो रहे, जबकि पश्चिमी जिलों में अच्छी बारिश हो रही है।

पिछले मानसून सीजन के आंकड़ों के अनुसार पूरे उत्तर प्रदेश में औसतन सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई थी। हालांकि क्षेत्रवार तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामान्य से 32 प्रतिशत अधिक बारिश हुई, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में औसतन 3 प्रतिशत कम वर्षा रिकॉर्ड की गई।

देवरिया में सबसे ज्यादा बारिश की कमी दर्ज

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में पिछले वर्ष बारिश का गंभीर संकट देखने को मिला। रिपोर्टों के अनुसार देवरिया में जहां पूरे मानसून सीजन में लगभग 759.4 मिलीमीटर वर्षा सामान्य मानी जाती है, वहां केवल 97.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई। यह सामान्य से करीब 87 प्रतिशत कम थी।

सिर्फ देवरिया ही नहीं, गोरखपुर में 43 प्रतिशत, मऊ में 53 प्रतिशत, आजमगढ़ में 40 प्रतिशत और बलिया में 21 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। दूसरी ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में औसत से काफी अधिक बारिश हुई।

मानसून ट्रफ की स्थिति बनती है सबसे बड़ा कारण

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मानसून ट्रफ वर्षा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह कम दबाव का एक क्षेत्र होता है जो उत्तर भारत से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला रहता है।

जब मानसून ट्रफ अपनी सामान्य स्थिति में रहती है, तब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में अच्छी बारिश होती है। लेकिन जब यह उत्तर की ओर खिसक जाती है तो वर्षा का केंद्र पहाड़ी राज्यों की ओर चला जाता है। ऐसे में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में अधिक बारिश होती है, जबकि पूर्वांचल के कई जिले अपेक्षाकृत सूखे रह जाते हैं।

पश्चिमी विक्षोभ से पश्चिमी यूपी को मिलता है फायदा

पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर और पश्चिम एशिया क्षेत्र से आने वाली मौसम प्रणाली है। पहले इसका प्रभाव मुख्य रूप से सर्दियों तक सीमित माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में मानसून के दौरान भी इसकी सक्रियता बढ़ी है।

जब पश्चिमी विक्षोभ राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऊपर सक्रिय होता है तो वहां अतिरिक्त नमी और वर्षा की स्थिति बनती है। पश्चिमी यूपी इन प्रणालियों के प्रभाव क्षेत्र में आता है, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश अक्सर इनके सीधे प्रभाव से बाहर रहता है।

बंगाल की खाड़ी से मिलने वाली नमी भी पड़ रही कमजोर

पूर्वी उत्तर प्रदेश की बारिश काफी हद तक बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमीयुक्त हवाओं पर निर्भर करती है। सामान्य परिस्थितियों में ये हवाएं बिहार होते हुए पूर्वांचल तक पहुंचती हैं और अच्छी वर्षा कराती हैं।

हालांकि इसके लिए बंगाल की खाड़ी में सक्रिय निम्न दबाव प्रणाली का बनना जरूरी होता है। यदि ऐसी प्रणाली कमजोर हो या मानसून ट्रफ असामान्य स्थिति में हो, तो नमी पूर्वांचल तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती।

अत्यधिक गर्मी भी बन रही बारिश की दुश्मन

विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में बढ़ती गर्मी और लगातार पड़ने वाली लू भी वर्षा को प्रभावित कर रही है।

जब जमीन अत्यधिक गर्म हो जाती है तो ऊपर से आने वाले बादलों और सतह के तापमान के बीच असंतुलन पैदा होता है। इससे कई बार बादल पर्याप्त वर्षा किए बिना आगे बढ़ जाते हैं। मौसम विभाग ने भी इस वर्ष जून में उत्तर प्रदेश में सामान्य से अधिक गर्मी और लू की स्थिति रहने का अनुमान जताया है।

अल नीनो का असर भी पड़ता है पूर्वी भारत पर ज्यादा

अल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो की स्थिति बनने पर मध्य और पूर्वी भारत के राज्यों में वर्षा अधिक प्रभावित होती है। वर्ष 2015-16 और 2023 के दौरान भी मानसून पर इसके प्रभाव देखे गए थे। इसी वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में बारिश की कमी अधिक दिखाई देती है।

इस बार भी कम बारिश की आशंका

मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक जून से सितंबर के बीच देश के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। यदि अल नीनो की स्थिति मजबूत होती है तो मानसून का वितरण असमान रह सकता है।

ऐसी स्थिति में कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं, जबकि अन्य इलाकों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में जून के दौरान तेज गर्मी और लू की चेतावनी भी जारी की गई है।

vineet verma

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