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मायके से आई वो पोटली, जिसे खोलते ही नम हो जाती हैं बेटियों की आंखें! मगध की सावन पुरिया में छिपा है अपनों का प्यार

गया: मगध क्षेत्र में सावन का महीना केवल भगवान शिव की भक्ति और हरियाली से जुड़ा पर्व नहीं है, बल्कि विवाहित बेटियों के लिए मायके से आने वाली एक खास पोटली का भी इंतजार रहता है। इसे सावन पुरिया कहा जाता है। हरे कपड़ों, चूड़ियों और श्रृंगार की चीजों से सजी यह पुरिया जब बेटी के ससुराल पहुंचती है तो उसमें सामान से कहीं ज्यादा मायके का स्नेह और शुभकामनाएं होती हैं।

कपड़े और चूड़ियों से कहीं बढ़कर है सावन पुरिया

सावन पुरिया में विवाहित बेटी के लिए हरे रंग के कपड़े, हरी चूड़ियां, मेहंदी और श्रृंगार का सामान भेजा जाता है। इस परंपरा को बेटी के सुखी दांपत्य जीवन, सौभाग्य और खुशहाली की कामना से जोड़ा जाता है। सावन आते ही विवाहित महिलाओं को मायके से आने वाली इस पुरिया का इंतजार रहने लगता है।

शादी के बाद पहली पुरिया का अलग महत्व

नवविवाहिता के लिए शादी के बाद आने वाली पहली सावन पुरिया खास मानी जाती है। इसे लेकर मायके और ससुराल दोनों जगह उत्साह रहता है। नए कपड़े और श्रृंगार सामग्री मिलने के बाद कई परिवारों में नवविवाहिता सजने-संवरने के साथ घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद भी लेती है।

बेटी के साथ ससुराल वालों के लिए भी भेजे जाते हैं उपहार

सावन पुरिया सिर्फ बेटी के लिए भेजे जाने वाले सामान तक सीमित नहीं रहती। मायके की ओर से ससुराल पक्ष के लिए मिठाई और दूसरे उपहार भी भेजने की परंपरा है। इसके जरिए बेटी के नए परिवार के प्रति सम्मान और अपनापन जताया जाता है। इस रीति के माध्यम से दोनों परिवारों के बीच रिश्तों की मिठास भी मजबूत होती है।

पोटली खुलते ही क्यों याद आता है मायका?

विवाहित बेटी के लिए मायके से आया सामान महज उपहार नहीं होता। उसके साथ बचपन, परिवार और अपनों की यादें भी जुड़ी होती हैं। यही वजह है कि सावन पुरिया मिलने और उसे खोलने के दौरान कई बेटियां भावुक हो जाती हैं। इस पोटली में मौजूद सामान के साथ मायके का स्नेह और बेटी के सुखी जीवन की शुभकामनाएं भी जुड़ी होती हैं।

सावन पुरिया में क्या-क्या भेजा जाता है?

सावन पुरिया में शामिल सामान परिवार और क्षेत्र के हिसाब से अलग हो सकता है। आमतौर पर इसमें हरी चूड़ियां, हरे रंग के कपड़े या साड़ी, श्रृंगार सामग्री, मेहंदी, सिंदूर, बिंदी, मिठाई और फल शामिल किए जाते हैं।

मगध की यह परंपरा आज भी मायके और ससुराल के बीच स्नेह और अपनापन बनाए रखने वाली लोकरीति के रूप में निभाई जाती है।

vineet verma

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