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Tamil Nadu Election 2026: 35 साल में पहली बार बीजेपी, AIADMK, डीएमके और कांग्रेस ने नहीं दिया एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार, क्या बदल गई राज्य की राजनीति?

news desk
Last updated: April 6, 2026 3:40 pm
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Tamil Nadu Election 2026
Tamil Nadu Election 2026
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चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में इस बार एक ऐसा ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है जिसने सबको चौंका दिया है। आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के लिए राज्य की चार प्रमुख पार्टियों— बीजेपी, AIADMK, डीएमके और कांग्रेस— ने अपनी उम्मीदवार सूची में एक भी ब्राह्मण चेहरे को जगह नहीं दी है। सबसे ज्यादा चर्चा AIADMK की हो रही है, जिसने पिछले 35 वर्षों में पहली बार इस समुदाय से पूरी तरह दूरी बनाई है। यह कदम राज्य के बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की ओर एक बड़ा इशारा माना जा रहा है।

Contents
AIADMK की रणनीति में बड़ा बदलाव: जयललिता युग का अंत?द्रविड़ राजनीति और ‘लो-रिटर्न’ का चुनावी गणितछोटी पार्टियों ने दिखाई बड़ी सोचयह बदलाव क्यों मायने रखता है? (Analysis)चुनाव 2026: मुख्य बिंदु

AIADMK की रणनीति में बड़ा बदलाव: जयललिता युग का अंत?

तमिलनाडु की राजनीति में कभी एमजीआर और फिर जे. जयललिता के दौर में ब्राह्मण समुदाय को AIADMK में खास प्रतिनिधित्व मिलता था। खुद जयललिता इसी समुदाय से थीं और उनके समय में इस वर्ग को टिकट मिलना एक नियमित परंपरा थी।

  • इतिहास: 2021 के चुनाव तक पार्टी ने रिटायर्ड डीजीपी आर. नटराज जैसे चेहरों को मौका दिया था।
  • वर्तमान: 2026 में पार्टी ने पूरी तरह अलग राह चुनते हुए एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है।
  • बीजेपी का रुख: आश्चर्यजनक रूप से, NDA गठबंधन में 27 सीटों पर लड़ रही बीजेपी ने भी किसी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया, जबकि तमिलनाडु ब्राह्मण एसोसिएशन (TAMBRAS) ने उन्हें समर्थन देने का ऐलान किया है।

द्रविड़ राजनीति और ‘लो-रिटर्न’ का चुनावी गणित

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु में ब्राह्मणों की आबादी लगभग 3% है। बड़ी पार्टियों द्वारा इस समुदाय को नजरअंदाज करने के पीछे कुछ ठोस कारण हो सकते हैं:

  1. वोट बैंक का शिफ्ट होना: पिछले एक दशक में ब्राह्मण वोट बैंक काफी हद तक बीजेपी की ओर शिफ्ट हुआ है, जिससे क्षेत्रीय दलों को इस वर्ग से “चुनावी लाभ” कम नजर आ रहा है।
  2. सोशल इंजीनियरिंग: अब पार्टियों का पूरा फोकस गौंडर, थेवर, वन्नियार और दलित जैसे बड़े सामाजिक समीकरणों पर है, जो चुनाव के नतीजों को सीधे प्रभावित करते हैं।
  3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: द्रविड़ आंदोलन की जड़ें ब्राह्मण-विरोधी विमर्श से जुड़ी रही हैं। जयललिता के बाद अब पार्टियां फिर से अपनी मूल द्रविड़ पहचान की ओर लौटती दिख रही हैं।

छोटी पार्टियों ने दिखाई बड़ी सोच

जहां बड़ी पार्टियों ने दूरी बनाई है, वहीं नई और छोटी पार्टियां इस खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही हैं:

  • TVK (विजय की पार्टी): अभिनेता विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ ने 2 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है।
  • NTK (नाम तमिलर काची): सीमान की पार्टी ने सबसे ज्यादा 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इसे ब्राह्मण समुदाय के लिए एक नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

यह बदलाव क्यों मायने रखता है? (Analysis)

तमिलनाडु की राजनीति में यह “प्रतिनिधित्व का शून्य” कई मायनों में अहम है:

  • प्रतिष्ठा बनाम शक्ति: ब्राह्मण समुदाय का प्रशासनिक और सांस्कृतिक प्रभाव तो है, लेकिन चुनावी राजनीति में अब उनकी संख्यात्मक शक्ति कम आंकी जा रही है।
  • पहचान की राजनीति: यह कदम दिखाता है कि तमिलनाडु में अब पहचान की राजनीति (Identity Politics) अधिक प्रखर हो गई है, जहाँ जातीय आधार पर टिकट का वितरण जीत की गारंटी माना जाता है।

चुनाव 2026: मुख्य बिंदु

  • मतदान की तारीख: 23 अप्रैल 2026।
  • बड़ा उलटफेर: प्रमुख चार पार्टियों की लिस्ट में शून्य ब्राह्मण उम्मीदवार।
  • प्रमुख फोकस: द्रविड़ पहचान और बड़े जातीय वोट बैंक।

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