सियासी

असम में राहुल गांधी ने उतारी ‘संकटमोचकों’ की टीम! 10 साल बाद किस समीकरण से कमबैक करना चाहती है कांग्रेस?

इस साल देश में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस के खाते में कुछ खास नहीं मिला। लेकिन इन पांच राज्यों में होने वाले चुनावों को लेकर कांग्रेस काफी संभावनाएं देख रही है। खासकर असम को लेकर।

असम में कांग्रेस की उम्मीदें किस कदर परवान चढ़ी हैं, इसका अंदाज़ा असम की चुनावी टीम को देखकर लगाया जा सकता है। राज्य में विधानसभा चुनाव का ऐलान अभी नहीं हुआ है, लेकिन कांग्रेस ने अपनी किलेबंदी शुरू कर दी है। पार्टी ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और झारखंड के आदिवासी नेता बंधु तिर्की को असम का वरिष्ठ पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। इसके साथ ही प्रियंका गांधी वाड्रा को असम चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी की चेयरपर्सन बनाना यह संकेत देता है कि कांग्रेस इस बार असम को हर हाल में जीतना चाहती है।

असम में कांग्रेस का इतिहास लंबा और गहरा रहा है। 2001, 2006, 2011 और 2016 तक कांग्रेस सत्ता में रही, लेकिन 2016 और 2021 में बीजेपी ने न सिर्फ सरकार बनाई, बल्कि कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया। पिछले एक दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस के लिए 2026 “करो या मरो” जैसा चुनाव बन चुका है। बीते 10 वर्षों से विपक्ष में बैठी कांग्रेस अब 2026 को “कमबैक इलेक्शन” मानकर चल रही है।

किन मुद्दों के सहारे कांग्रेस?

कांग्रेस के मुद्दे क्या हैं? पहला, बेरोज़गारी और युवाओं का भविष्य। कांग्रेस का आरोप है कि सरकारी नौकरियों के वादे सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रह गए हैं। दूसरा, CAA और नागरिकता का सवाल। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर असम में आज भी असंतोष है, जिसे कांग्रेस एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में भुनाना चाहती है। तीसरा, ज़मीन और आदिवासी अधिकार। भूमि अधिग्रहण, बेदखली और आदिवासी इलाकों में असुरक्षा कांग्रेस के एजेंडे का अहम हिस्सा है।

चौथा, महंगाई और भ्रष्टाचार। कांग्रेस लगातार बीजेपी सरकार पर सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक अहंकार के आरोप लगा रही है। पांचवां, सामाजिक सौहार्द। कांग्रेस खुद को विभाजन की राजनीति के मुकाबले “समावेशी शासन” के विकल्प के रूप में पेश कर रही है।

बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ कांग्रेस अब व्यापक रणनीति पर काम कर रही है। एक ओर पार्टी ने CPI(M), रायजोर दल, असम जातीय परिषद, CPI, CPI(ML) लिबरेशन और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया है, तो दूसरी ओर संगठन को जमीनी स्तर पर मज़बूत करने की कोशिश तेज़ की गई है। गौरव गोगोई को प्रदेश अध्यक्ष बनाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

असम में चलेगा डीके का तिलिस्म?

असम में डीके शिवकुमार की भूमिका खास मानी जा रही है। जिन्हें कर्नाटक और तेलंगाना में जीत की रणनीति का मास्टरमाइंड माना जाता है, असम में संगठन को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करने की जिम्मेदारी निभाएंगे। तेलंगाना और कर्नाटक में उनकी चुनावी रणनीति और संगठनात्मक पकड़ ने उन्हें कांग्रेस का “संकटमोचक” बना दिया है। सवाल यह है कि क्या वही मॉडल असम में भी काम कर पाएगा, जहां जातीय, क्षेत्रीय और नागरिकता जैसे मुद्दे कहीं ज्यादा संवेदनशील हैं।

असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले कांग्रेस ने पूरी ताक़त झोंक दी है। वरिष्ठ नेताओं की तैनाती और प्रियंका गांधी वाड्रा की सीधी एंट्री, ये सभी संकेत देते हैं कि असम कांग्रेस के लिए सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। क्या प्रियंका गांधी की सक्रिय भूमिका, डीके शिवकुमार की रणनीति और गठबंधन की ताकत मिलकर बीजेपी के 10 साल के शासन को चुनौती दे पाएगी?

15 साल बाद कांग्रेस के लिए असम की ज़मीन दोबारा हासिल करना आसान नहीं है, लेकिन अगर एंटी-इन्कम्बेंसी, स्थानीय मुद्दे और संगठन एकजुट हुए, तो 2026 असम की राजनीति में बड़ा मोड़ ला सकता है।

असम सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि कांग्रेस की साख और राष्ट्रीय वापसी की परीक्षा भी है। असम जीतना कांग्रेस के लिए सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में पुनर्जीवन का सवाल है। असम कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है और यहां जीत बीजेपी के नॉर्थ-ईस्ट वर्चस्व को सीधी चुनौती होगी।

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