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7 लाख डुप्लीकेट वोटर्स हटाने का दावा, लेकिन प्रशांत किशोर के नाम पर दो आईडी – क्या चुनाव आयोग की ‘शुद्ध लिस्ट’ ही हो गई फेल?

बिहार विधानसभा चुनावों से महज एक हफ्ते पहले, चुनाव आयोग (ECI) ने जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) को दो वोटर आईडी कार्ड के मामले में नोटिस जारी कर दिया. लेकिन PK ने इसे सिस्टम की नाकामी बताते हुए खुली चुनौती दे दी – “मुझे गिरफ्तार करो!” ये विवाद सिर्फ एक पॉलिटिशियन की पर्सनल गड़बड़ी नहीं, बल्कि ECI की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) 2025 की व्यापक कमजोरी को उजागर करता है. अगर PK जैसे हाई-प्रोफाइल केस में डुप्लिकेशन पकड़ा नहीं गया, तो लाखों आम वोटर्स का क्या हाल होगा? और यह सवाल भी उठाता है, 7 लाख डुप्लीकेट वोटर्स जो हटाये गए वो कितने सही थे?

PK का ड्यूल वोटर आईडी चुनौती या सिस्टम फेलियर?

28 अक्टूबर को जारी नोटिस में, रोहतास जिले के करगहर विधानसभा क्षेत्र के रिटर्निंग ऑफिसर ने PK से तीन दिनों में जवाब मांगा. नोटिस में कहा गया कि एक न्यूज रिपोर्ट के आधार पर, PK का नाम बिहार और पश्चिम बंगाल दोनों की वोटर लिस्ट में दर्ज है. ये Representation of the People Act, 1950 की धारा 17 का उल्लंघन है, जो एक व्यक्ति को दो जगह रजिस्ट्रेशन की मनाही करता है.

PK ने पटना में पत्रकारों से कहा, “अगर मैंने कोई कानून तोड़ा है, तो मुझे गिरफ्तार कर लो. लेकिन ये ECI की SIR ड्राइव की नाकामी है. उन्होंने स्पष्ट किया कि बंगाल का वोटर आईडी 2021 में TMC के लिए काम करते हुए रजिस्टर किया गया था. PK ने तर्क दिया : “ये डुप्लिकेशन सिस्टम की गड़बड़ी है, मेरी नहीं. SIR ने लाखों वोटर्स को डराया, लेकिन फर्जी एंट्रीज को साफ नहीं किया.”

SC की फटकार: 65 लाख डिलीट वोटर्स का रहस्य क्यों?

PK का केस बिहार SIR की कमजोरियों का ‘टिप ऑफ द आइसबर्ग’ है. जनवरी 2025 की समरी रिवीजन के बाद, ECI ने जून में SIR की घोषणा की, जिसके तहत 1 अगस्त को ड्राफ्ट रोल पब्लिश हुआ. इसमें 7.89 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर्स में से करीब 65 लाख नाम कट गए – मौत, माइग्रेशन या डुप्लिकेशन के आधार पर. लेकिन ECI ने इन डिलीट वोटर्स के नाम, कारण और बूथ-वाइज लिस्ट पब्लिश नहीं की.
सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त 2025 को इंटरिम ऑर्डर जारी कर ECI को फटकार लगाई. जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस ज्योमल्या बागची की बेंच ने कहा, “22 लाख डेड वोटर्स के नाम क्यों नहीं बताए? फैमिली मेंबर्स को पता ही नहीं कि उनके रिश्तेदारों को ‘डेड’ मार्क किया गया. ये आर्टिकल 326 (एडल्ट सफ्रेज का अधिकार) का उल्लंघन है.”
ADR (Association for Democratic Reforms) और PUCL जैसी NGOs ने इसे ‘मास एक्सक्लूजन’ बताया, जो फ्री एंड फेयर इलेक्शन को खतरे में डालता है.

SIR की व्यापक कमजोरियां: लाखों डुप्लिकेट्स बचे?

SIR का मकसद वोटर लिस्ट को ‘शुद्ध’ बनाना था, लेकिन नतीजे उलटे आए. 30 सितंबर को फाइनल रोल पब्लिश हुआ, जिसमें 7.42 करोड़ नाम हैं – 21 लाख नए ऐडिशन और 3.66 लाख एक्सक्लूजन. लेकिन कांग्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 लाख से ज्यादा डुप्लिकेट एंट्रीज अभी भी बची हैं (सेम नेम, एड्रेस, लेकिन अलग EPIC). कुल 68.66 लाख एंट्रीज डिलीट हुईं, जिनमें 7 लाख डुप्लिकेट रजिस्ट्रेशन शामिल.

क्या वोटर्स का अधिकार खतरे में?

6-11 नवंबर को होने वाले बिहार चुनावों में 243 सीटें दांव पर हैं. SIR ने जेंडर रेशियो को 934 से गिराकर 892 कर दिया, और मुस्लिम-बहुल जिलों में ज्यादा डिलीट्स हुए. SC ने 9 अक्टूबर को बिहार स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी को डायरेक्शन दिया कि एक्सक्लूडेड वोटर्स को अपील फाइल करने में मदद करें.
अब देखना ये है कि क्या PK का चैलेंज SIR को रिफॉर्म की दिशा में धकेलेगा? या ये सिर्फ चुनावी ड्रामा साबित होगा? बिहार के वोटर्स इंतजार कर रहे हैं – ट्रांसपेरेंसी का, न कि नोटिस का.

Gopal Singh

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