गाजियाबाद। गाजियाबाद के हरीश राणा पिछले 13 सालों से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। साल 2013 में हुए एक हादसे ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी। तब से वह लगभग अचेत अवस्था में हैं और सिर्फ उनकी सांसें ही चल रही हैं।
उनका शरीर भले ही जीवित है, लेकिन दिमाग पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है। वह न कुछ बोल पा रहे हैं और न ही किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
इसी बीच, उनकी हालत को देखते हुए पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं।
राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में भर्ती हरीश राणा की जिंदगी अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। परिवार की सहमति और कानूनी प्रक्रिया के तहत उनके लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) लागू कर दी गई है। इस फैसले के बाद अस्पताल प्रशासन ने धीरे-धीरे उनके सभी लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
बताया जा रहा है कि आज से हरीश को पानी देना भी बंद कर दिया जाएगा। इससे पहले ट्यूब के माध्यम से दिया जा रहा भोजन भी रोक दिया गया था। अब पानी बंद करने के बाद फीडिंग ट्यूब को कैप कर दिया जाएगा, हालांकि ट्यूब को शरीर से नहीं निकाला जाएगा। वर्तमान में उन्हें किसी प्रकार का ऑक्सीजन सपोर्ट भी नहीं दिया जा रहा है।
एम्स के डॉक्टरों के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से की जा रही है और इसमें लगभग 3 से 4 सप्ताह का समय लग सकता है। 31 वर्षीय हरीश राणा लंबे समय से अचेत अवस्था में हैं और उनकी हालत में सुधार की कोई संभावना नहीं बची है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निष्क्रिय इच्छामृत्यु को दी गई अनुमति के तहत तय प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है। इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक विशेष मेडिकल टीम का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता पैलिएटिव मेडिसिन विभाग की प्रमुख डॉ. सीमा मिश्रा कर रही हैं। टीम में न्यूरोसर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया, पैलिएटिव केयर और मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ शामिल हैं।
परिवार के लिए यह फैसला बेहद भावुक और कठिन है, लेकिन लंबे समय से पीड़ा में जी रहे अपने बेटे को सम्मानजनक विदाई देने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।