महिलाओं को 33% आरक्षण
नई दिल्ली: भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में एक युगांतरकारी बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण को हकीकत में बदलने के लिए एक ऐसा ‘मैथमेटिकल फॉर्मूला’ तैयार किया है, जो न केवल महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करेगा, बल्कि देश के राजनीतिक मानचित्र को भी पूरी तरह बदल देगा। इस नए प्रस्ताव के केंद्र में है— सीटों की संख्या में 50% का इजाफा।
सरकार की योजना बेहद रणनीतिक है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है। गणित सीधा है: मौजूदा सीटों को 1.5 से गुणा किया जाएगा। इस विस्तार का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि मौजूदा सांसदों और विधायकों की सीटें सुरक्षित रहेंगी, और बढ़ी हुई अतिरिक्त सीटों के जरिए महिलाओं को 33% (273 सीटें) आरक्षण दे दिया जाएगा। इससे ‘अपनों’ को खोने का डर खत्म होगा और महिलाओं का स्वागत भी होगा।
इस नए परिसीमन का सबसे व्यापक असर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश पर पड़ेगा। 2011 की जनगणना को आधार मानें तो यूपी की राजनीतिक तस्वीर कुछ ऐसी होगी:
यह बदलाव उत्तर प्रदेश को देश की सत्ता के केंद्र के रूप में और अधिक मजबूती देगा। इसके बाद पश्चिम बंगाल (441 विधानसभा सीटें), महाराष्ट्र (432) और बिहार (365) जैसे राज्य भी बड़े सियासी पावर हाउस बनकर उभरेंगे।
| राज्य | वर्तमान विधानसभा सीटें | प्रस्तावित नई सीटें (लगभग) |
| उत्तर प्रदेश | 403 | 604 |
| पश्चिम बंगाल | 294 | 441 |
| महाराष्ट्र | 288 | 432 |
| बिहार | 243 | 365 |
| तमिलनाडु | 234 | 351 |
यद्यपि यह फॉर्मूला ‘विन-विन सिचुएशन’ (सबकी जीत) जैसा दिख रहा है, लेकिन राह इतनी भी आसान नहीं है। विपक्ष ने अभी से दो मुख्य बिंदुओं पर घेराबंदी शुरू कर दी है:
अगर यह प्रस्ताव कानून की शक्ल लेता है, तो 2029 का आम चुनाव भारत के लिए एक ‘री-लॉन्च’ जैसा होगा। यह सिर्फ संख्या बढ़ाने का खेल नहीं है, बल्कि यह जमीनी स्तर पर नए निर्वाचन क्षेत्रों के उदय, नए नेतृत्व की पहचान और आधी आबादी को नीति निर्धारण के मुख्य पटल पर लाने की एक ईमानदार कोशिश है।
बजट सत्र की सरगर्मियों के बीच, सबकी नजरें इसी बात पर हैं— क्या भारत की संसद इस ऐतिहासिक विस्तार के लिए तैयार है?
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