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शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन से पहले नेताओं की नजरबंदी ? जम्मू-कश्मीर में आरक्षण नीति बना सियासी टकराव का मुद्दा

छात्रों के अधिकार और शिक्षा नीति एक मज़बूत लोकतंत्र की पहचान माने जाते हैं। लेकिन जब इन्हीं सवालों पर आवाज़ उठाने की तैयारी हो, और उससे पहले ही सख्ती शुरू हो जाए, तो बहस सिर्फ नीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सत्ता और अभिव्यक्ति के टकराव तक पहुंच जाती है। जम्मू-कश्मीर में फिलहाल यही तस्वीर सामने आई है।

जम्मू-कश्मीर में छात्र आरक्षण नीति के खिलाफ प्रस्तावित शांतिपूर्ण प्रदर्शन से ठीक पहले प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं को नजरबंद कर दिया है। यह कार्रवाई रविवार, 28 दिसंबर को श्रीनगर में की गई। प्रशासन का कहना है कि इसका उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना था, जबकि विपक्ष इसे छात्रों की आवाज़ दबाने की कोशिश बता रहा है।

प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक जिन नेताओं को हाउस अरेस्ट किया गया है, उनमें पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और उनकी बेटी इल्तिजा मुफ्ती शामिल हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के श्रीनगर से सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी, पीडीपी नेता वहीद पारा और श्रीनगर के पूर्व मेयर जुनैद मट्टू को भी नजरबंद किया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक  इन सभी नेताओं के आवासों पर पुलिस तैनात की गई और बाहर निकलने पर रोक लगा दी गई।

दरअसल, यह पूरा मामला जम्मू-कश्मीर की मौजूदा छात्र आरक्षण नीति से जुड़ा है। छात्र काफी समय से मांग कर रहे हैं कि आरक्षण की व्यवस्था को सही और स्पष्ट किया जाए। उनका आरोप है कि इस मुद्दे पर सरकार लगातार देरी कर रही है। एक साल पहले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस विषय पर एक समिति के गठन का ऐलान किया था, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।

इसी देरी के विरोध में छात्रों ने गुपकर रोड पर शांतिपूर्ण धरने का ऐलान किया था। कई राजनीतिक नेताओं ने इस आंदोलन के समर्थन में शामिल होने की बात कही थी। लेकिन प्रदर्शन से पहले ही हुई नजरबंदी ने पूरे मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया।

राजनीतिक हलकों में इस कार्रवाई को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। महबूबा मुफ्ती और अन्य नेताओं ने पहले ही छात्रों के साथ एकजुटता जताते हुए इसे शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा सवाल बताया था। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोका जाना अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार है।

इस पूरे मामले को आसपास के देशों और इलाके की स्थिति के हिसाब से भी देखा जा रहा है। हाल के दिनों में बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में भी छात्र आंदोलनों ने सरकारों को असहज किया था । ऐसे में जम्मू-कश्मीर में छात्रों के मुद्दे पर अपनाया गया यह सख्त रुख व्यापक बहस को जन्म दे रहा है।

छात्र आरक्षण नीति से जुड़ा यह विवाद अब सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं रह गया है। यह जम्मू-कश्मीर की राजनीति, प्रशासनिक फैसले और नागरिक के अधिकारों के बीच संतुलन की एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में सरकार इस असंतोष को संवाद और नीति के जरिए संभालती है या सख्ती के रास्ते पर आगे बढ़ती है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

news desk

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