फारस की खाड़ी में अमेरिकी एयर रिफ्यूलिंग टैंकर और MQ-4C Triton ड्रोन की गतिविधि की खबर, ईरान ने नए हमले की स्थिति में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब एक नए और संवेदनशील मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। एक तरफ ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए सात शर्तें रखी हैं, वहीं दूसरी तरफ फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां बढ़ने की खबर सामने आई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों देशों के बीच कूटनीति का रास्ता खुलेगा या संघर्ष का दायरा और बढ़ेगा।
20 सितंबर को ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रेजाई ने कहा कि तेहरान ने अमेरिका के सामने बातचीत के लिए सात शर्तें रखी हैं। उनकी ओर से बताई गई प्रमुख मांगों में सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त करना, ईरान की फ्रीज संपत्तियों को जारी करना और ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करना शामिल है। रेजाई ने यह भी कहा कि नई अमेरिकी कार्रवाई की स्थिति में ईरान जवाब देने के लिए तैयार है।
ईरान की इन शर्तों के बीच फारस की खाड़ी में कम से कम सात अमेरिकी हवाई ईंधन भरने वाले टैंकर विमानों की गतिविधि की खबर सामने आई है। ऐसे विमान लंबी दूरी तक अभियान चलाने वाले लड़ाकू और अन्य सैन्य विमानों को हवा में ईंधन उपलब्ध करा सकते हैं।
क्षेत्र में अमेरिकी MQ-4C Triton निगरानी ड्रोन की गतिविधि की भी रिपोर्ट सामने आई है। ईरानी सरकारी मीडिया ने बंदर अब्बास के ऊपर अज्ञात विमानों की मौजूदगी का दावा किया है, हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
ईरान की सैन्य कमान ने संभावित अमेरिकी हमले की स्थिति में क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और हितों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है। अमेरिका की ओर से भी पश्चिम एशिया में मौजूद अपने नागरिकों के लिए सुरक्षा संबंधी चेतावनी जारी की गई है।
इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य है। ईरान पहले ही कह चुका है कि उसकी शर्तें पूरी होने तक इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को दोबारा खोलने की स्थिति नहीं बनेगी।
होर्मुज के रास्ते तेल की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही में बड़ी भूमिका है। यहां जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहने से कच्चे तेल, डीजल, परिवहन और उससे जुड़ी वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हाल के हफ्तों में होर्मुज संकट के बीच तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं।
होर्मुज संकट के बीच सऊदी अरब के लिए ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन एक अहम वैकल्पिक रास्ता है। करीब 1,200 किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब अपने तेल को फारस की खाड़ी से हटाकर लाल सागर के रास्ते निर्यात कर सकता है।
हाल ही में ड्रोन हमले में पाइपलाइन को नुकसान पहुंचने के बाद इसका संचालन रोकना पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक, यह पाइपलाइन प्रतिदिन करीब 40 से 50 लाख बैरल तेल ले जाने की क्षमता रखती है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के करीब 4 से 5 फीसदी के बराबर है। अमेरिका ने उम्मीद जताई थी कि मरम्मत के बाद इसका संचालन जल्द बहाल किया जा सकता है।
दूसरी ओर, यमन में हूती लड़ाकों की गतिविधियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। सऊदी अरब ने हूतियों की ओर से रियाद पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले की कोशिश की जानकारी दी थी, जिसे सऊदी सुरक्षा बलों ने रोकने का दावा किया। हूतियों ने सऊदी तेल ढांचे को निशाना बनाने का भी दावा किया है, हालांकि कुछ दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
बाब अल-मंदेब और होर्मुज दोनों महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं। ऐसे में अगर पश्चिम एशिया के अलग-अलग मोर्चों पर संघर्ष जारी रहता है तो ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक समुद्री व्यापार पर दबाव बढ़ सकता है।
तनाव के बीच इराक के इरबिल एयरपोर्ट के पास भी विस्फोट की आवाज सुनाई दी। शुरुआती रिपोर्टों में अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन की मौजूदगी वाले इलाके का जिक्र किया गया था। हालांकि कुर्द अधिकारियों ने बाद में कहा कि विस्फोट सैन्य प्रशिक्षण और सुरक्षा गतिविधियों से जुड़े थे और आम लोगों के लिए कोई खतरा नहीं था। किसी नुकसान या हताहत की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।
यमन की राजधानी सना में भी विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं। क्षेत्र में जारी सैन्य गतिविधियों के बीच इन घटनाओं ने पश्चिम एशिया में संघर्ष के और फैलने की आशंका को बढ़ा दिया है।
फिलहाल तस्वीर दो दिशाओं में जाती दिख रही है। ईरान ने बातचीत के लिए शर्तें रखी हैं, लेकिन साथ ही संभावित नए अमेरिकी हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। दूसरी तरफ अमेरिका की सैन्य गतिविधियों में तेजी की खबरों ने तनाव को और बढ़ा दिया है।
ऐसे में आने वाले दिनों में सबसे अहम नजर होर्मुज जलडमरूमध्य, अमेरिकी सैन्य तैनाती, ईरान की प्रतिक्रिया और यमन में हूती गतिविधियों पर रहेगी। इन मोर्चों पर तनाव बढ़ता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहकर वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर भी पड़ सकता है।
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