अमेरिका डील और किसानों का विरोध
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते ने देश में एक अलग ही बहस छेड़ दी है। जहां एक तरफ निर्यात से जुड़े सेक्टर खासकर सीफूड इंडस्ट्री खुश नजर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ किसान संगठनों में डर और नाराज़गी खुलकर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऐलान के मुताबिक भारत से अमेरिका जाने वाले सामान पर लगने वाला टैरिफ अब 25–50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत रह जाएगा। इससे भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में फिर से मजबूत पकड़ बनाने का मौका मिलेगा।
सीफूड एक्सपोर्टर्स के लिए बड़ी राहत
50 प्रतिशत टैरिफ की वजह से 2025 में अप्रैल से नवंबर के बीच सीफूड निर्यात को बड़ा झटका लगा था। वैल्यू में 6.3 प्रतिशत और मात्रा में करीब 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। अब टैरिफ घटने से उम्मीद है कि निर्यात फिर पुराने स्तर पर लौटेगा। आंध्र प्रदेश जैसे तटीय राज्यों में, जहां झींगा और मछली निर्यात ही स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इस फैसले का जमकर स्वागत हो रहा है। टीडीपी सांसद के. रघु रामकृष्ण राजू ने इसे एक्वा फार्मर्स के लिए “गेम-चेंजर” बताते हुए कहा कि इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी और तटीय इलाकों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
किसानों में डर, राजनीति भी गरमाई
हालांकि इस डील ने किसान संगठनों की चिंता भी बढ़ा दी है। अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस के बयान के बाद आशंका है कि अब अमेरिका अपनी सब्सिडी वाली फसलें जैसे सोयाबीन, मक्का, कपास और गेहूं भारतीय बाजार में ज्यादा मात्रा में उतार सकता है। संयुक्त किसान मोर्चा का आरोप है कि इससे देसी किसानों को भारी नुकसान होगा और स्थानीय मंडियां बर्बाद हो सकती हैं। वहीं व्यापार मंत्री पीयूष गोयल ने सफाई दी है कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित हैं। इसके बावजूद कांग्रेस समेत विपक्षी दल इस समझौते को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं और संसद में पूरी जानकारी देने की मांग कर रहे हैं।
पीएम मोदी की 2025 की अमेरिका यात्रा के बाद हुए इस समझौते को यूरोपीय संघ के साथ हालिया एफटीए के बाद भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। लेकिन इतना तय है कि जब तक किसानों की आशंकाओं पर सरकार साफ और ठोस जवाब नहीं देती, तब तक यह समझौता सियासी और सामाजिक बहस के केंद्र में बना रहेगा।
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