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मिडिल ईस्ट संकट का असर: महंगा तेल और कमजोर रुपया भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा सकते हैं दबाव

ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी जंग अब आर-पार की लड़ाई बनती जा रही है। ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है। ईरान लगातार बदले की कार्रवाई कर रहा है, जिससे हालात और अधिक गंभीर होते जा रहे हैं। क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बन गए हैं।

इस बीच पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान को कड़ी चेतावनी दी है।

भारत भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। भारत सरकार का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, बढ़ता व्यापार घाटा और कमजोर रेमिटेंस फ्लो के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

सरकार हालात की लगातार समीक्षा कर रही है। प्रधानमंत्री Narendra Modi स्वयं स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं और उन्होंने सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक की अध्यक्षता भी की है।

इजरायल और अमेरिका ने शनिवार सुबह ईरान पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई की। इस बड़े और समन्वित हमले में दर्जनों सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के मारे जाने की खबर सामने आई। इस घटनाक्रम के बाद खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता की आशंका बढ़ गई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसका असर शेयर बाजार, ऊर्जा बाजार और भारतीय रुपये पर भी दिख सकता है।

रुपये पर क्या होगा असर?

जापानी वित्तीय सेवा कंपनी Nomura की इंडिया और एशिया (जापान को छोड़कर) की मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ इकोनॉमिस्ट सोनल वर्मा ने ‘ईटी’ से बातचीत में कहा कि एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में भारत उन देशों में शामिल है, जहां तेल की ऊंची कीमतों का असर अपेक्षाकृत अधिक होता है।

वहीं Standard Chartered में इंडिया इकोनॉमिक रिसर्च की प्रमुख अनुभूति सहाय का कहना है कि भारत पर इसका प्रभाव मुख्य रूप से अप्रत्यक्ष चैनलों से पड़ेगा-जैसे कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और वैश्विक स्तर पर ‘रिस्क-ऑफ’ माहौल। उनके मुताबिक, रुपये में कमजोरी आ सकती है, हालांकि इसे अभी नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि Reserve Bank of India (RBI) के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है।

सहाय ने यह भी कहा कि सबसे बड़ा जोखिम इस बात से जुड़ा है कि मिडिल ईस्ट कितनी जल्दी स्थिर होता है। यदि टकराव लंबा खिंचता है, तो भारत में तेल की कीमतों, आर्थिक वृद्धि और महंगाई के समीकरण पर असर पड़ेगा।

सोनल वर्मा के अनुसार, भारत अपनी घरेलू जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और इसका लगभग आधा हिस्सा Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। ऐसे में तेल की कीमतों में कितनी और कितने समय तक बढ़ोतरी होती है, इसी पर व्यापक आर्थिक प्रभाव निर्भर करेगा।

कच्चे तेल में उछाल और बाजार की प्रतिक्रिया

विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 17 पैसे गिरकर 91.08 पर बंद हुआ। पिछले एक महीने में कच्चे तेल की कीमत लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत अपनी जरूरत का करीब 88-89 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है।

वर्मा का मानना है कि तेल की ऊंची कीमतों का महंगाई पर फिलहाल सीमित असर हो सकता है, क्योंकि तेल विपणन कंपनियों द्वारा खुदरा कीमतें बढ़ाने की संभावना कम है। इससे आर्थिक वृद्धि को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है। हालांकि, करंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी के लगभग 1

फीसदी पर फिलहाल प्रबंधनीय है, लेकिन मुख्य जोखिम पूंजी खाते पर दबाव से जुड़ा है, खासकर अगर भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेश में और गिरावट आती है। अनुमान है कि तेल की कीमतों में हर 10 फीसदी की बढ़ोतरी से जीडीपी पर करीब 0.4 फीसदी तक असर पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा प्रभाव?

सोनल वर्मा के मुताबिक, यह फिलहाल अल्पकालिक जोखिम नजर आता है, जिसे संभाला जा सकता है। भारत का मध्यम अवधि का आर्थिक दृष्टिकोण अभी भी सकारात्मक बना हुआ है।

रेटिंग एजेंसी ICRA की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर ने कहा कि बदलते हालात और अनिश्चितता का भारतीय मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतकों पर क्या असर पड़ेगा, इस पर करीबी नजर रखी जा रही है। फिलहाल मजबूत घरेलू मांग कुछ राहत दे रही है।

उन्होंने आगाह किया कि यदि तनाव लंबा चलता है, तो महंगाई, दोहरे घाटे (राजकोषीय और चालू खाता) और रेमिटेंस फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है। जनवरी में खुदरा महंगाई 2.75 फीसदी दर्ज की गई थी।

वहीं Bank of Baroda के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस का मानना है कि बॉन्ड यील्ड पर बड़ा असर संभव नहीं दिखता, लेकिन रुपये में उतार-चढ़ाव जरूर बढ़ सकता है।

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