H-1B वीजा पर फैले भ्रम के बाद व्हाइट हाउस ने बताई सच्चाई
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुक्रवार को जारी किए गए नए कार्यकारी आदेश ने H-1B वीजा धारकों और टेक इंडस्ट्री में हलचल मचा दी थी. आदेश के बाद यह खबर तेजी से फैली कि अब H-1B वीजा के लिए हर साल 1,00,000 अमेरिकी डॉलर (करीब 90 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस देनी होगी. इस सूचना ने भारतीय आईटी पेशेवरों और बड़ी कंपनियों में चिंता और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी.
हालांकि शनिवार को व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लैविट ने इस मामले पर स्थिति साफ करते हुए कहा कि – “100,000 अमेरिकी डॉलर का शुल्क वार्षिक नहीं है. यह सिर्फ एक बार की फीस है और केवल उन लोगों पर लागू होगी जो पहली बार H-1B वीजा के लिए आवेदन करेंगे.”
पहले से वीजा धारकों पर कोई असर नहीं
प्रेस सचिव ने स्पष्ट किया कि जो लोग पहले से H-1B वीजा पर कार्यरत हैं, उन पर इस नियम का कोई असर नहीं होगा. वहीं जिनके आवेदन 21 सितंबर 2025 से पहले दायर किए जा चुके हैं, वे भी इससे बाहर रहेंगे.
दरअसल, अमेरिकी कॉमर्स सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने शुक्रवार को बयान दिया था कि यह शुल्क हर साल देना होगा. इसके बाद टेक कंपनियों और इमीग्रेशन विशेषज्ञों में हड़कंप मच गया. लेकिन शनिवार को व्हाइट हाउस ने स्थिति साफ कर दी और बताया कि यह एकमुश्त शुल्क है.
टेक कंपनियों पर असर
अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियों में बड़ी संख्या में H-1B वीजा धारक कर्मचारी काम करते हैं. शुरुआती भ्रम की वजह से कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को ईमेल भेजकर सतर्क रहने और जल्द से जल्द अमेरिका लौटने की सलाह दी थी.
व्हाइट हाउस ने बयान जारी करते हुए कहा कि नए नियम का उद्देश्य अमेरिकी श्रमिकों की नौकरियों की सुरक्षा और वीजा प्रोग्राम में हो रहे दुरुपयोग पर रोक लगाना है.
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