नई दिल्ली: आज 3 अप्रैल 2026 को दुनिया भर में गुड फ्राइडे मनाया जा रहा है। यह वह दिन है जब प्रभु यीशु मसीह को सूली (क्रूस) पर चढ़ाया गया था। लेकिन एक सवाल जो सदियों से कौतूहल का विषय रहा है, वह यह कि—जिस दिन मानवता के मसीहा को इतनी शारीरिक पीड़ा और मृत्यु दी गई, उसे ‘बुरा’ (Bad) कहने के बजाय ‘गुड’ (Good) क्यों कहा जाता है?
इसके पीछे छिपे हैं भाषाई बदलाव, बाइबल के गहरे तर्क और प्राचीन साहित्य के रहस्य। आइए इस ‘गुड’ शब्द के पीछे के चार प्रमुख कारणों को समझते हैं:
- ‘गौउड’ से ‘गुड’ तक का सफर : इतिहास और भाषा विज्ञान के अनुसार, “गुड” शब्द का अर्थ हमेशा से केवल “अच्छा” नहीं था। बीबीसी की एक ऐतिहासिक रिपोर्ट और 1290 ईस्वी की डिक्शनरी का हवाला दें तो पहले इस दिन को “गौउड फ्राइडे” (Guode Friday) कहा जाता था। समय के साथ उच्चारण बदला और यह ‘गुड फ्राइडे’ के रूप में विश्वभर में प्रचलित हो गया।
- ‘पवित्रता’ का प्राचीन अर्थ : प्राचीन काल में ‘गुड’ शब्द का इस्तेमाल ‘पवित्र’ (Holy) के पर्यायवाची के रूप में भी होता था। यही कारण है कि ग्रीक और लैटिन साहित्य में इसे आज भी ‘होली फ्राइडे’ यानी पवित्र शुक्रवार कहा जाता है। चूंकि यीशु का बलिदान मानवता को पापों से मुक्त करने के लिए एक ‘पवित्र कार्य’ था, इसलिए इस दिन के साथ यह विशेषण जुड़ गया।
- बाइबल का गहरा दर्शन: जन्म से महान है मृत्यु : बाइबल की किताब ‘सभोपदेशक’ (Ecclesiastes 7:1) में एक अत्यंत गूढ़ बात कही गई है— “इंसान की मृत्यु का दिन उसके जन्म के दिन से अधिक पवित्र और श्रेष्ठ होता है।” ईसाई धर्म के जानकारों का मानना है कि यीशु ने मृत्यु को गले लगाकर मृत्यु पर ही विजय प्राप्त की थी। उनके बलिदान ने ही मोक्ष और उद्धार का मार्ग खोला, इसीलिए इसे ‘गुड’ यानी कल्याणकारी माना गया।
- ईस्टर की उम्मीद का आधार : गुड फ्राइडे को अकेला नहीं देखा जा सकता। यह ईस्टर संडे की भूमिका है। ईसाई धर्म की मान्यता है कि यदि शुक्रवार को बलिदान न होता, तो रविवार को पुनर्जीवन (Resurrection) भी न होता। यह दिन इस उम्मीद का प्रतीक है कि दुख और मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नई और शाश्वत शुरुआत का मार्ग हैं।