बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखें तय हो चुकी हैं. पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर को और दूसरा चरण 11 नवंबर को होना है. लेकिन चुनावी तारीखों के ऐलान के बाद भी दोनों प्रमुख गठबंधनों NDA और INDIA (पूर्व में महागठबंधन) के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर जबरदस्त खींचतान जारी है.
NDA में अंदरूनी असहमति और सहयोगी दलों का दबाव
भले ही बीजेपी और जेडीयू के बीच गठबंधन की ‘मजबूत समझ’ का दावा किया जा रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है. एलजेपी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान खुलकर नाराज़ हैं. उन्हें 25 से 28 सीटों का ऑफर मिला है, लेकिन वे 40 सीटों से कम पर तैयार नहीं हैं. चिराग साफ कह चुके हैं कि अगर उन्हें “सम्मानजनक हिस्सेदारी” नहीं दी गई, तो वह किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बनेंगे.
इसी तरह, हम पार्टी के जीतन राम मांझी को 8–10 सीटों का प्रस्ताव दिया गया है, लेकिन वे भी इससे खुश नहीं हैं.
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को लगभग 5 से 6 सीटें मिल सकती हैं.
सूत्रों के मुताबिक, NDA के भीतर सीटों का 80% बंटवारा तय हो चुका है, लेकिन चिराग, मांझी और कुछ अन्य दलों की मांगों के चलते आधिकारिक ऐलान अटका हुआ है.
जन सुराज के साथ नई सियासी चाल?
इस बीच चिराग पासवान की ओर से एक नया राजनीतिक संकेत सामने आया है. उन्होंने कहा है कि अगर NDA में बात नहीं बनी, तो प्रशांत किशोर (PK) की पार्टी ‘जन सुराज’ के साथ गठबंधन का रास्ता खुला है. यह बयान सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक समीकरण की संभावित शुरुआत भी माना जा रहा है.
PK पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि उनकी पार्टी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी
- बिहार SIR के बाद जारी फाइनल लिस्ट पर उठे सवाल! योगेन्द्र यादव ने कहा- ‘सिर्फ बिहार में लगी है ब्रेक’
उनकी पार्टी पारदर्शिता, संगठनात्मक मजबूती और ग्राउंड कनेक्शन पर ज़ोर दे रही है. ऐसे में चिराग और PK का साथ आना, NDA के लिए बड़ा झटका बन सकता है.
INDIA गठबंधन में भी सीटों पर फंसा गणित
उधर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में बना INDIA गठबंधन भी सीट बंटवारे के पेंच में उलझा हुआ है. कांग्रेस कम से कम 70 सीटों की मांग कर रही है, जबकि उन्हें 55 से कम सीटों का ऑफर मिला है.
राजद खुद 130 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है.वाम दलों को 35, VIP को 20 और कुछ छोटे दलों को राजद के कोटे से एडजस्ट करने की योजना बनाई जा रही है.तेजस्वी यादव को भले ही गठबंधन की समन्वय समिति का प्रमुख बनाया गया है, लेकिन कांग्रेस की ज़िद और सहयोगी दलों की ऊंची मांगों ने सीट बंटवारे का फॉर्मूला फंसा दिया है.