नई दिल्ली, 24 सितंबर – भारत में आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े दो बड़े नाम अफजल गुरु और मकबूल भट्ट आज भी सुर्खियों में बने हुए हैं. दोनों को अलग-अलग मामलों में मौत की सज़ा दी गई थी और दोनों को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी के बाद वहीं दफनाया गया. हाल ही में उनकी कब्रों को हटाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है.
कब्रों को लेकर विवाद
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक लोकहित याचिका दायर कर दोनों आतंकवादियों की कब्रों को तिहाड़ जेल से हटाने की मांग की गई. याचिकाकर्ता का कहना था कि इन कब्रों से आतंकवाद की महिमा बढ़ सकती है और जेल परिसर को “आतंकवादी तीर्थ स्थल” बनाया जा सकता है. हालांकि अदालत ने 24 सितंबर 2025 को यह याचिका खारिज कर दी और कहा कि दफन का निर्णय उस समय का संवेदनशील प्रशासनिक कदम था. जिसमें वर्षों बाद हस्तक्षेप करना न्यायिक दायरे से बाहर है.
संसद हमले का दोषी अफजल गुरु
13 दिसंबर 2001 को संसद भवन पर आतंकी हमला हुआ था जिसमें पांच आतंकी शामिल थे. इस हमले में आठ सुरक्षाकर्मी और एक माली शहीद हुए थे. मामले की जांच में जम्मू-कश्मीर निवासी अफजल गुरु को दोषी पाया गया. 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी फांसी की सजा बरकरार रखी और राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज होने के बाद गुरु को 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई. सुरक्षा कारणों से उनका शव परिवार को नहीं सौंपा गया और जेल परिसर में ही दफनाया गया.
मकबूल भट्ट का मामला
मकबूल भट्ट जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के संस्थापक और अलगाववादी नेता थे. उन पर एक भारतीय राजनयिक की हत्या का आरोप सिद्ध हुआ था. अदालत ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई और 11 फरवरी 1984 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई. भट्ट को भी जेल परिसर में ही दफनाया गया. अफजल गुरु और मकबूल भट्ट की फांसी और दफ़न पर विवाद भारत की राजनीति, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था के बीच जटिल संतुलन को दर्शाता है. अदालत के फैसले के बावजूद यह मुद्दा आज भी राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है.