युद्ध के अंत के लिए अब अमेरिकी शांति पहल
यूक्रेन पिछले तीन साल से रूस के खिलाफ जंग में है. लेकिन अब ये जंग यूक्रेन के लिए सांप छूछूंदर वाली स्थिति में तब्दील हो चुका है. आर्थिक और मानवीय नुकसान के चलते यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की दबाव में दिखने लगे हैं. जैसा उनके बयानों से झलक रहा है. ज़ेलेंस्की ने कहा कि, ‘ये युद्ध रूस ने शुरू किया और रूस ही एकमात्र देश है जो इसे रोक सकता है.’ जिसका सीधा मतलब निकाला जा सकता है कि युद्ध रोकने के लिए चल रही वार्ता में रूसी हस्तक्षेप किस हद तक पहुंच चुका है.
हार का डर या कूटनीतिक दांव?
ऐसे में ये सवाल उठने लगा है कि क्या लंबी और विनाशकारी लड़ाई के कारण हार का डर अब ज़ेलेंस्की को युद्धविराम की ओर धकेल रहा है? यूक्रेन को हुए बेतहाशा नुकसान ने देश के भविष्य पर एक गंभीर क्वेश्चन मार्क लगा दिया है. क्या ये थकावट अब यूक्रेन को वार्ता की मेज पर झुकने के लिए मजबूर करेगी?
24 फरवरी 2022 से अब तक
जब 24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण शुरू किया, तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि ये जंग इतनी लंबी चलेगी और इतना विनाश लाएगी खासकर यूक्रेन के लिए. इस युद्ध में यूक्रेन की बड़ी तबाही हुई है. उसकी सोच थी कि यूरोप और अमेरिका की मदद से वो रूस को झुका देगा और काला सागर पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेगा. लेकिन आज तीन साल बाद खंडहर बने शहर, गिरती अर्थव्यवस्था और पड़ोसी के रूप में और खतरनाक हो चुका रसिया ही यूक्रेन का हासिल है.
यूक्रेन पर तबाही का असर
हजारों नागरिकों और सैनिकों ने अपनी जान गंवाई है. लाखों यूक्रेनियन अपना घर छोड़कर शरणार्थी बनने को मजबूर हुए, जिससे यूरोप में सबसे बड़ी पलायन की समस्या पैदा हुई. देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे जैसे पावर प्लांट, अस्पताल और शहर बुरी तरह तबाह हो गए. यूक्रेन को फिर से खड़ा करने की लागत खरबों डॉलर में आंकी जा रही है. युद्ध ने देश की इकोनॉमी को घुटनों पर ला दिया है. महत्वपूर्ण एग्रीकल्चरल और इंडस्ट्रियल उत्पादन ठप पड़ने से ग्लोबल फूड सप्लाई चेन पर भी गहरा असर पड़ा है.
अमेरिका की शांति पहल
वर्तमान हालात ये है कि अब अमेरिका ने कॉन्फ़्लिक्ट एंडिंग के लिए एक एक्टिव रोल अपना लिया है. हालांकि, डिप्लोमैटिक हलकों से आ रही खबरे यूक्रेन की चिंताएं बढ़ा रही हैं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि अपकमिंग पीस टॉक्स या सीज़फ़ायर फ्रेमवर्क में अधिकतर शर्तें मॉस्को के एजेंडे के हिसाब से तय होगा. इससे भी यही संकेत मिलता है कि यूक्रेन की आखिरी उम्मीद भी धरी की धरी रह जाएगी
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