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लाल किला धमाका केस: सिस्टम की नींद या मिलीभगत? अल-फलाह की वो सच्चाई जो पूछी जानी चाहिए

news desk
Last updated: November 20, 2025 5:34 pm
news desk
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ल-फलाह यूनिवर्सिटी का सच
ल-फलाह यूनिवर्सिटी का सच
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10 नवंबर 2025 को लाल किले के पास एक कार में हुए धमाके में 13 लोगों की मौत हो गई. देश सदमे में था. इसके बाद जांच शुरू हुई और एक नाम लगातार सामने आने लगा — अल-फलाह यूनिवर्सिटी.
18 नवंबर को ED ने 25 से अधिक जगहों पर छापेमारी की और यूनिवर्सिटी के संस्थापक जावेद अहमद सिद्दीकी को गिरफ्तार कर लिया.
लेकिन इस पूरे मामले में असली सवाल कुछ और है —
अगर यहां सचमुच गलत काम हो रहा था तो 11 साल तक किसी को पता क्यों नहीं चला?

यूनिवर्सिटी की शुरुआत और मान्यताएं

अल-फलाह यूनिवर्सिटी 2014 में हरियाणा विधानसभा के एक्ट 21 ऑफ 2014 के तहत बनी.
संस्थापक थे जावेद अहमद सिद्दीकी, जिन पर 2000 के दशक में 7.5 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में सजा हो चुकी थी.
इसके बावजूद—
• 2015 में UGC की मान्यता
• AIU की सदस्यता
• 2019 में MARB से 150 MBBS सीटों की मंजूरी
• 2023 में PG कोर्सेज का अप्रूवल
यानी सभी नियामक संस्थाओं ने लगातार हरी झंडी दी.

ED की जांच में क्या निकला?

जांच में जो बातें सामने आईं, वह चौंकाने वाली हैं—
• एक ही पते पर 9 शेल कंपनियां
• फर्जी NAAC मान्यता
• UGC के 12(B) दर्जे का गलत दावा
• फंड्स को परिवार की कंपनियों में डायवर्ट किया गया
• 30 लाख कैश बरामद
• और सबसे गंभीर — कैंपस से बरामद एक कार जो उस डॉक्टर की थी जिस पर जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग बनाने का आरोप है

टेरर मॉड्यूल की कड़ियां: डॉक्टर जो आतंकवादी बन गए
जांच के अनुसार, धमाके और आतंकी साजिश में यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टरों के नाम सामने आए—
• डॉ. उमर नबी — असिस्टेंट प्रोफेसर, आरोप है कि वही धमाके वाली कार चला रहे थे
• डॉ. मुजम्मिल शकील और डॉ. शाहीन सईद — UAPA के तहत आरोपी
• डॉ. निसार-उल-हसन — जिन्हें 2023 में J&K सरकार ने सुरक्षा कारणों से निकाला था; अल-फलाह ने भर्ती किया
फरीदाबाद में किराए के कमरों में 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट छिपा मिला — इतना कि कई शहरों को तबाह कर सकता था.
Signal ग्रुप पर प्लानिंग
3 महीने पहले बनाया गया Signal ग्रुप
– डॉ. मुजम्मिल
– डॉ. अदील अहमद राठर
– मौलवी इरफान वागे
– डॉ. मुजफ्फर अहमद राठर
यानी यह कोई अचानक हमला नहीं था, बल्कि लंबी तैयारी वाली साजिश.

हमेशा दोहराया जाने वाला ‘पैटर्न’
भारत में हर बड़े आतंकी हमले के बाद लगभग एक जैसा सीक्वेंस देखने को मिलता है—

  1. हमला → मीडिया हंगामा
  2. जांच → तेज कार्रवाई
  3. गिरफ्तारियां → सरकार की तारीफ
  4. 2–3 महीने बाद → खबर ठंडी
  5. 6 महीने बाद → जनता भूल जाती है
  6. फिर नया हमला → वहीं से शुरुआत
    इन घटनाओं के बाद भी खुफिया एजेंसियों में सिस्टमेटिक सुधार क्यों नहीं हो पाता?

क्या खुफिया एजेंसियों ने वाकई कुछ नहीं देखा?
भारत में RAW, IB, NIA, ED और स्टेट इंटेलिजेंस जैसी कई एजेंसियां हैं.
फिर भी—
• 11 साल तक कोई ऑडिट नहीं
• संस्थापक का क्रिमिनल रिकॉर्ड नजरअंदाज
• 2,900 किलो विस्फोटक का भंडारण
• टेरर लिंक वाले डॉक्टरों की भर्ती
तीन संभावनाएं सामने आती हैं—

  1. जानकारी नहीं थी
    कमजोर संभावना, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर विस्फोटक इकट्ठा होना छुप नहीं सकता.
  2. जानकारी थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई
    अक्सर राजनीतिक दबाव या inter-agency coordination की कमी वजह बनती है.
  3. राजनीतिक नैरेटिव का इस्तेमाल
    हमलों के बाद “मजबूत सरकार” और “राष्ट्रवाद” की राजनीति तेज होती है.
    पुलवामा–बालाकोट → 2019 चुनाव इसका उदाहरण.

पहलगाम हमला 2025: निगरानी की असल तस्वीर

शेख सज्जाद गुल — एक सजा पाए आतंकी —
MBA करता रहा, लैब चलाता रहा, अलग-अलग राज्यों में घूमता रहा… और किसी को पता नहीं चला.
यह बताता है कि मॉनिटरिंग सिस्टम लगभग न के बराबर है.

क्या आतंकवाद कम हुआ या सिर्फ नजरों से ओझल किया गया?
2014–2024 में बड़े शहरी हमले कम हुए, लेकिन Global Terrorism Index में भारत 13वें स्थान पर बना रहा.

सवाल उठता है— क्या सुरक्षा बढ़ी है या सिर्फ रिपोर्टिंग का तरीके बदला है?

अल-फलाह मामले के असली सवाल

  1. इतनी मान्यताएं एक ऐसे संस्थापक को कैसे मिली जिसके खिलाफ सजा थी?
  2. 11 वर्षों में किसी एजेंसी ने संदेह क्यों नहीं जताया?
  3. 2,900 किलो विस्फोटक एक राज्य में कैसे घूमता रहा?
  4. टेरर लिंक वाले डॉक्टरों की नियुक्ति पर नियंत्रण क्यों नहीं?
  5. शेल कंपनियां और मनी लॉन्ड्रिंग पर ED और IT की नजर क्यों नहीं गई?

सिस्टम में सुधार कब?
भारत को जरूरत है—
• खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय
• शैक्षणिक संस्थानों की मजबूत मॉनिटरिंग
• वित्तीय लेनदेन पर सख्त निगरानी
• राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने की
आतंकवाद की निंदा ज़रूरी है, लेकिन सिस्टम की जवाबदेही उससे भी ज्यादा ज़रूरी.
अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर कार्रवाई सिर्फ एक केस नहीं — यह भारतीय सुरक्षा ढांचे की गहरी खामियों का आईना है.
सवाल यह है—
क्या यह कार्रवाई वाकई किसी बड़े सुधार की शुरुआत है या कुछ महीनों बाद फिर सब कुछ भूल जाएगा?
जवाब—
यह हमें ही तय करना है कि हम सिर्फ रिएक्ट करेंगे या सिस्टम से जवाब मांगेंगे.

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