उत्तर प्रदेश में, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपनी राजनीतिक ज़मीन वापस पाने के लिए एक निर्णायक कदम उठा रही है. पार्टी सुप्रीमो मायावती ने 2027 विधानसभा चुनावों को देखते हुए, अपने मुख्य वोट बैंक दलितों को मुस्लिम समुदाय के साथ फिर से जोड़ने के लिए राज्य भर में ‘भाईचारा कमेटियों’ को सक्रिय किया है.
यह रणनीति दो मुख्य लक्ष्यों पर आधारित है:
सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को तोड़ना: बसपा का मानना है कि मुस्लिम वोट सपा को जाने के बावजूद भाजपा को हरा नहीं पाया है. इसलिए, ‘भाईचारा कमेटियों’ (जिनमें दलित और मुस्लिम दोनों सह-संयोजक हैं) के ज़रिए बसपा सीधे मुस्लिम समुदाय से यह अपील कर रही है कि वे अपना समर्थन सपा को न दें, बल्कि बसपा को दें, जो ‘सांप्रदायिक ताकतों’ को हराने में ज़्यादा सक्षम है.
दलित-मुस्लिम एकता को पुनर्जीवित करना: 2012 के बाद से कमज़ोर हुई बसपा, इन कमेटियों के माध्यम से दलित और मुस्लिम वोटरों के बीच ज़मीनी स्तर पर भाईचारा और विश्वास बहाल करने की कोशिश कर रही है. यह उसकी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को दोहराने का प्रयास है हालांकि यह पुराना दांव इस नए परिवेश में कितना कारगर होगा यह आने वाला समय ही बतायेगा. एक और जहाँ महागठबंधन मजबूत जनाधार बनाता दिख रहा है.
मायावती का यह दाँव, जिसमें ओबीसी भाईचारा कमेटियों को भी शामिल किया गया है, उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान को त्रिकोणीय बनाने की क्षमता रखता है. यदि बसपा मुस्लिम और दलित वोटरों के बड़े हिस्से को एकजुट कर पाती है, तो यह सीधे तौर पर सपा के आधार को कमज़ोर करेगा, जिससे आगामी चुनावों का समीकरण पूरी तरह से बदल सकता है. यह कदम बसपा की राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए ‘करो या मरो’ जैसा है.