नई दिल्ली/मुंबई | इस्लामाबाद में शांति की उम्मीदें टूटने के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में फंस गई है। ईरान और अमेरिका के बीच किसी समझौते (MoU) पर सहमति न बन पाने और ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी के सख्त रुख ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दहशत पैदा कर दी है। इसका सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों और शेयर बाजारों पर देखने को मिल रहा है।
दलाल स्ट्रीट पर ‘रक्तपात’: सेंसेक्स और निफ्टी धराशायी
सप्ताह के पहले ही दिन भारतीय निवेशकों के अरबों रुपये डूब गए। बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स में 1600 अंकों से ज्यादा की भारी गिरावट देखी गई, जिससे यह 76,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसल गया। वहीं, निफ्टी ने अपना महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल 23,600 तोड़ दिया है।
गिरावट का कारण: तेल आयात पर भारत की निर्भरता सबसे बड़ी चिंता है। तेल महंगा होने से घरेलू महंगाई बढ़ने और वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ने का डर निवेशकों को सता रहा है।
कच्चे तेल में $100 का ‘विस्फोट’
इस्लामाबाद वार्ता विफल होते ही ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 7% से ज्यादा का उछाल आया। लंबे समय बाद तेल $100 प्रति बैरल के पार निकलकर $102 के स्तर पर पहुंच गया है। ट्रंप की ‘होर्मुज की घेराबंदी’ वाली धमकी ने सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका को हवा दी है।
वॉल स्ट्रीट से एशियाई बाजारों तक ‘लाल निशान’
- सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया इस कूटनीतिक विफलता का खामियाजा भुगत रही है:
- एशिया: जापान का निक्केई (Nikkei) 56,500 के नीचे आ गया है, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) 1.8% से अधिक टूट गया।
- अमेरिका: वॉल स्ट्रीट में हाहाकार की स्थिति है। डाऊ फ्यूचर्स (Dow Futures) में 550 अंकों की गिरावट यह संकेत दे रही है कि अमेरिकी बाजार भी भारी दबाव में खुलेंगे।
बाजार जानकारों का मानना है कि यदि कच्चा तेल $100 के ऊपर स्थिर रहता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी अनिवार्य हो जाएगी। इससे लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन महंगा होगा, जिसका सीधा असर आम आदमी की थाली और अर्थव्यवस्था की रिकवरी पर पड़ेगा।